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अप्रैल 09, 2018

सादगी ए ज़िन्दगी...

मैंने इस सादगी ए ज़िन्दगी से पल्ला झाड़ लिया
ज़िन्दगी की सच्चाई ने मुझमें कटुता भर दिया


जिस किरदार को हमने बड़े मासूमियत से संजोया
उसकी बचपने में लोगों ने जहर है घोल दिया


बड़ी इत्मिनान की नींद कभी सोया करते थे हम
नींद की गलियारे में कभी सरपट दौड़ा करते थे हम


मन के किसी कोने में गर अंधेरा छा जाता था कभी
अपने बुलन्द हौसलों से रोशनी भर देते थे हम


अब तो घर में कोई नसीहत देने वाला भी नहीं रहा
बड़े-बूढ़ों का साया भी सर के ऊपर से निकल गया


कोशिश कर रहा हूँ इस दुनिया की गहराई को नाप लूँ
ऊपरवाले की कारीगरी की मीन मेख पहचान लूँ


लगता है इसी ऊहापोह में ये ज़िन्दगी भी गुज़र जाएगी
कि कत्ले सादगी-मासूमियत से ज़िंदगी सँवर जाएगी

नवंबर 12, 2017

शून्य काल










शून्य का मैं खोज हूँ 
शून्य का मैं ओज हूँ 
शून्य  के रथ पर सवार 
शून्य का मैं आज हूँ 

शून्य का कपाट हूँ 
शून्य सा विराट हूँ 
शून्य सा ही क्षुद्र मैं 
शून्य का ललाट हूँ 

अवसाद में है शून्यता 
विषाद में है शून्यता 
प्रसन्नता में शून्यता 
विपन्नता में शून्यता 

शून्य मेघ का गरज 
शून्य विद्युत सा लरज 
शून्य सूर्य सा है तप्त 
शून्य चंद्र सा है सर्द


शून्य सा प्रखर हूँ मैं
शून्य का शिखर हूँ मैं
शून्य सा हूँ मापदण्ड
शून्य सा मुखर हूँ मैं

शून्य का अलाप हूँ
शून्य का विलाप हूँ
शून्य का हूँ शब्दरूप
शून्य का संलाप हूँ

रात्रि शून्य में विलय
शून्य शनि का वलय
तारकों में टिमटिमाता
प्रकाश का महाप्रलय

शून्य में है स्तब्धता
शून्य में है क्षुब्धता
शून्य को विराम दो
कि शून्य में है गत्यता

शून्य मार्ग प्रशस्त कर
बाधाएं निरस्त कर
शत्रु को शिकस्त दे तू
धर्म को तदर्थ धर

आओ शून्य में चलें
आओ शून्य में ढलें
शून्य के आकाश में
हम ह्रस्व-दीर्घ पग भरें

जुलाई 12, 2017

गद्दारों सम्भल जाओ ....








गद्दारों सम्भल जाओ 
तुम न अब चल पाओगे 
जुल्म तुम्हारा खत्म हुआ 
अब पब्लिक से पिट जाओगे 

चाहे जितने पत्थर फेंको 
चला लो गोली सीने पे 
मर मिटेंगे अपने मुल्क पर
या शत्रुओं को छलनी कर देंगे 

भ्र्ष्ट राजनेताओं को 
जड़ से हम उखाड़ेंगे 
दहशतगर्दों को सरेआम 
पेड़ों पर लटकायेंगे 

नापाक़ खून से पाक़ ज़मीं को 
अब नहीं रंगने  देंगे 
दुश्मनों के घर में घुसकर 
उनको कफ़न ओढ़ाएंगे 


जून 16, 2017

हाथों में मेहंदी .....


हाथों में मेहंदी जो लगा ली
अब पल्लू को सँभालूँ कैसे
भारी-भरकम पाजेब पहने
चुपके से मिलने आऊँ कैसे
अजीब है इश्क़ की फितरत
करने को है हजार बातें
सामने तुम और ये लब ख़ामोश
ज़ुबाँ पे ताला पड़ा हो जैसे
रात बेरात आँखे जगती है
समां बांधती है तुम्हारा ख़याल
गुफ्तगू एक तुम्हीं से है 
तुम्हीं से है हज़ारों सवाल 
मेहंदी की बातें मेहँदी ही जाने 
उफ्फ  कोई तरीका तो हो 
मिलूं  तुमसे पर पाजेब के 
ज़ुबाँ पे ताला लगा तो दो  

मई 06, 2017

जीना सिखा दे













ऐ ज़िन्दगी मुझे जीना सिखा दे
अपनों से बिछड़ कर भी खुश होना सिखा दे 
आइने में बसा है जो यादों का डेरा 
उस आईने से अपनों का चेहरा मिटा  दे

हर शख्स खुदगर्ज़  है हर चेहरा नकली
उन चेहरों को ढूंढ़ रही हूँ जो बनते थे असली
बन जाऊँ  मैं  उन जैसा ये चाहत तो नहीं 
इनके साथ जीने का सबक सिखा दे 

मुझसे ये मुखौटा न पहना गया 
असली नकली चेहरे न पहचाना गया 
दुःख के दिन जब भी मेरे सामने आये 
तनहा छोड़ के गए उनसे रुका न गया 





मई 02, 2017

गांव का मकान









याद आता है ख़ूब वो गांव का मकान
वो खुली सी ज़मीन वो खुला आसमान
वो बड़ा सा आंगन और ऊंचा रोशनदान
वो ईंटों का छत और पतंगों की उड़ान
वो बचपन की शरारत नानी बाबा का दुलार
उस आंगन में मनता था छोटे बड़े त्योहार
बच्चों की किलकारियां और खुशियां हजार
कई रिश्तों का घर था वो था रिश्तों में प्यार
आज भी ज़हन में है बसा  वो घर
मिली थी जहाँ हमें दो जहां का प्यार

जुलाई 02, 2016

माथे की लकीरों में



माथे की लकीरों में बसा है 
तज़ुर्बा - ए -ज़िन्दग़ी 
यूं ही नहीं बने हैं 
ज़ुल्फ़-ए-सादगी ॥ 

ख़्वाहिशों से भरा घर 
मुक़म्मल हो नहीं सकता 
बहुत सी ठोकरें खाकर 
सम्भला है ज़िन्दगी ॥ 

अरमान अपने भुलाकर ही 
पाया है अपनों का प्यार 
हसरतें अपनी छुपाकर ही 
मिली है खुशियां हज़ार ॥ 

हम बे मुरव्वत मुरादबीं 
अपने इरादों को मसलकर 
अपनों में बसे अपनों की 
अपनीयत ढूंढते है ॥ 



अप्रैल 06, 2016

वो दिन बारिश के.....











याद है वो दिन बारिश के ?
जब भी निकले- छाते को बंद कर  -
लटकाए से घूमा करते थे -


भींगना था पर पानी में ही नही ,
तुम्हारे साथ बीते हुए पलों के
 बौछारों में -

सनसनाती हवाएं , सोंधी सी 
मिटटी की खुशबू , बताये देती थी ,
मौसम भींगा है -

बहुत देर तक - चुपचाप-जाते हुए 
लम्हों को देखा करते थे - कोशिश थी -
पकड़ने की-

वक्त अपने वक्त के हिसाब से -
वक्त दिखाकर चला गया-हम लम्हों -
को ढूँढ़ते रह गए -

रास्ते अब भी वहीं है -
बारिश के दिनों में भींगती हुई -      
बस दो हाथ अलग हुए ॥ 

मार्च 30, 2016

छुईमुई सी लम्हें ....










छुईमुई सी लम्हें 
खुश्बू से भरी वो यादें 
तेरे आने की आहट 
वो झूठ मूठ के वादे 

छुप-छुपके पीछे आना 
हाथों से आँखें ढकना 
पकडे जाने के डर  से 
दीवारों में छुप जाना 

तेरे खातिर जो दिल ये 
डोल -डोल फिरता था 
तुझसे ही जाने क्यों ये 
मुझको छिपाए फिरता था 

वो आँखें ढूंढती सी 
जो मुझपे ही फ़िदा थी 
पर तुम न जान पायी 
मुझे जान  से वो प्यारी थी 

धीरे से सामने आना 
आकर सीने से लिपटना 
लम्हों से गुज़ारिश थी ये 
धीरे धीरे सरकना 

यादों के बज़्म से ये
 कुछ चित्र बनाया मैंने 
पर लम्हों की फितरत है 
उसे छू न सका किसी ने 

कैसे समझाऊँ दिल को 
लहूलुहान है ये 
वो  अतीत के पल जो 
सूई चुभो जाती है 


जुलाई 25, 2015

रंग....फीका सा









हंसती हुई आँखों में जो प्यार का पहरा रहता है-
असल में उन आँखों के ज़ख्म गहरे होते है ||

जलती हुई लौ भी जो उजारा करे मजारों को-
सुना है उन मजारों को बड़ी तकलीफ होती है ||

दिल जो किसी के प्यार का जूनून लिए चलता है-
उन्हीं दिलों में धोखों के अफ़साने छुपे रहते है ||

रात जो लेकर आती है चांदनी की बौछारें -
उन्हीं रातों में अमावस की रात भी शामिल होती है ||

हवाओं में बहती हुई दिखते है जो प्यार के रंग-
उन्हीं रंगों में एक रंग फीका सा भी होता है ||


जून 13, 2014

बिंब



झरनों सा गीत गाता ये मन 
सरिता की कलकल मधुगान 
सृष्टि है.... अनादि-अनंत 
भावनाओं से भरा है ये प्राण 

वरदान है कण-कण में छुपा 
दुःख-वेदना से जग है भरा 
पर स्वर्ण जीवन से भरा है 
नदी-सागर और ये धरा 

गूंजता स्वर नील-नभ में 
मोरनी … नाचे वन  में 
गा  रहा है गीत ये मन 
देख प्रकृति की ये छटा 

सोंधी महक में है एक नशा 
चन्द्रमा का प्रेम है निशा 
स्वप्नमय है ये वसुंधरा 
दिन उजला रात है घना 

देख श्याम घन गगन में 
ह्रदय-स्पंदन.... बढे रे 
नृत्य करे मन मत्त क्षण में 
सुप्त नाड़ी भी जगे रे 

कल-कल सरित गुंजायमान 
नद नदी सागर प्रवाहमान 
पुष्प सज्जित है उपवन 
और धरित्री चलायमान  




जून 06, 2014

इशकनामा





जिस्मों से परे दो रूहों को-
मिलाता है इश्क़ 
जीते है साथ और जीने की ख़ुशी -
दिलाता है इश्क़ 

प्रेम दरिया में डूबकर भी प्यासा 

रह जाता है इश्क़ 
समंदर सी गहराई औ नदी सा-
मीठा पानी है इश्क़ 

बादल गरजे तो बूँद बन जिस्म 

भिगोती है इश्क़ 
प्रेम-ज्वार परवान तो चढ़े पर भाटा
 न आने दे इश्क़ 

अनहद-नाद-साज़ प्रेम-गह्वर से 

प्रतिध्वनित है इश्क़ 
मंदिरों में घंटी सी बजे और मस्जिदों में
 अजान है इश्क़ 

इश्क़ इंसान से हो या वतन से मिटने को 

तैयार रहता  है इश्क़ 
ख़ुश्बुओं से ग़र पहचान होती गुलाब की 
शोख रवानी है इश्क़ 

ख्यालों में सवालों में.....जवाब ढूंढ

 लाती है इश्क़ 
  आसमान रंग बदले चाहे पड़ता नहीं 
फीका रंग-ए-इश्क़ 

सिमट जायेगी ये दुनिया गर मिट जाए 

नामों निशां-ए-इश्क़ 
बीज जो पनपते ही रंग दे दुनिया वो
 खूबसूरत तस्वीर है इश्क़ 











अप्रैल 27, 2014

लम्हों में जीती रही....












पत्तों के हिलने मे तेरे आने की आहट सुनूँ 
तुम मेरे शहर मे आये तुमसे मिलने का ख्वाब बुनूं ||

शाम ढलने लगी  चिरागों से बात करने लगी 
तुम्हारे आने की इंतज़ार मे लम्हा-लम्हा पिघलती रही  ||

वफ़ा-ए -इश्क़ की कौन सी तस्वीर है ये 
तेरे पाँव के निशाँ  मे ही अपना वज़ूद ढूंढ़ती रही ||

मेरी सिसकियाँ शायद तुम तक न पहुँच पाया अभी
लम्हा कतरा-कतरा पिघलता रहा मै लम्हों में जीती रही ||







चित्र  गूगल साभार 

अप्रैल 08, 2014

नारी!! तुम ही....



तुम अनन्या तुम लावण्या
तुम नारी सुलभ लज्जा से आभरणा
तुम सहधर्मिनी तुम अर्पिता
तुम पूर्ण नारीश्वर गर्विता


उत्तरदायित्वों की तुम निर्वाहिनी
तुम ही पुरुष की चिरसंगिनी
तुम सौन्दर्य बोध से परिपूर्णा
तुम से ही धरित्री आभरणा


तुम ही स्वप्न की कोमल कामिनी
तुमसे सजी है दिवा औ'यामिनी
शिशु हितार्थ पूर्ण जगत हो तुम
गृहस्थ की परिपूर्णता हो तुम


तुमसे ये धरा है चञ्चला
जननी रूप मे तुम निर्मला
कभी कठोर पाषाण हृदय से रंजित
कभी करूणामयी हृदय विगलित


कभी तुम अतसि-रूपसी सौन्दर्या
कभी हुंकारित रण-वीरांगना
हे नारी!! तुम ही सृष्टिकर्ता
तुमसे ही सम्भव पुरुष-प्रकृति वार्ता
©अनामिका




मार्च 30, 2014

फागुन का रंग





पाखी उड़ जा रे 
बहती हवा में महकी फ़िज़ा में, 
कल-कल बहती सरित-झरनों में, 
शीत का अंत है ये !!!

पीले हरे फूलों के रंग- 

पलाश-ढाक के पत्तों के संग,
भ्रमर गुंजायमान,वसंत के ढंग,
फागुन का रंग है ये !!!!

प्रेम-प्लावित ह्रदय अनुराग; 

आह्लादित मन  गाये विहाग; 
ऋतुराज ने छेड़ा वसंत राग- 
फागुन का दंश है ये !!!!

तारों भरा गगन रजनीकर-

तारक-दल-दीपों से उज्जवल, 
नभ पर जगमग जलता प्रतिपल 
फागुन का गगन है ये !!!

पाखी तेरा नीड़  सघन;  

डाली-डाली शाखा उपवन; 
सुखी तेरा संसार निज-जन- 
फागुन का बयार है ये !!!





फ़रवरी 27, 2014

विविधा


ईश्वरीय प्रेम। …।
जग में है सब अपने
मुक्ताकाश , पंछी , सपने
सुगन्धित धरती ,निर्झर झरने
आह्लादित तन मन
प्रेमदान का स्वर्गीय आनंद।।

प्रकृति चित्रण। ………
धरा,सरिता,औ' नील गगन
प्रस्फुटित पुष्प,वसंत आवागमन,
दारुण ग्रीष्म,शीत,और हेमंत
खग कलरव - गुंजायमान दिक्-दिगंत,
प्रकृति से परिपूर्णता का आनंद।।

प्रेम की विसंगतियां .......
जनमानस से परिपूर्ण इस जग में
एकाकीत्व का आभास रग - रग में
रहता है ये  आतुर मन प्रतीक्षारत
एकाकीत्व लगे अपना सा ।



दिसंबर 20, 2013

मन कोयला.....

मन कोयला बन जल राख  हुई 
धूआं उठा जब इस दिल  से 
 तेरा ही नाम लिखा फिर भी 
              हवा ने , बड़े जतन से 


        तेरी याद मन के कोने से 
        रह-रह कर दिल को भर जाए 
        जिन आँखों में बसते थे तुम 
              उन आँखों को रुला जाए 


जाने क्यों दिल की बस्ती में 
है आग लगी ,दिल जाने ना,
अंतस पीड़ा की ज्वाला भी 
जलता जाए बुझ पाए ना 

            नितांत अकेला सा ये दिल 
            शब्दों से भी छला जाए
             टूट कर बिखरे पल ये 
             हाथों से क्यों छूटा जाए ?

सौगात -ए - ग़म न माँगा था 
इश्क़-ए -दुनिया के दामन से 
जो भी मिला  सर आँखों पर 
कुछ इस मन से कुछ उस मन से 
             

नवंबर 15, 2013

शाश्वत और साकार .........

Art Image




एक मुट्ठी धूप पसरा है छत पर
सोचती हूँ बादल का कोइ टुकड़ा ;
गर ढक ले इस सुनहरे धूप को,
तो क्या आँच आएगी इस आँच को !!

आभास हुआ ......
बादल तो नटखट है
उड़ जाएगा हवा के साथ
अटखेलियां  करता हुआ
पर धूप से बादल की मित्रता तो क्षणिक है,,
वायु  और घन का साथ प्रामाणिक है ;
अस्तित्व धूप का निर्विकार है,
जीवन रस सा शाश्वत और साकार है

धूप का आवागमन निर्बाध है
ग्रहण से क्षणिक साक्षात्कार है,
बस यूँ ही सृष्टि का चलाचल है
धूप, बादल, ग्रहण इसी का फलाफल है ।।















  

नवंबर 09, 2013

अमावस में बिखेरूँगी.......



painting by sh raja ravi verma


चुप हूँ मैं.…पर उदास नहीं 
सपने ओझल हुए पर बुझे नहीं 
है  अनोखी सी ये ज़िन्दगी 
और ये गुज़रते वक़्त का साथ  ॥ 

दिन-दोपहर-रात..... एक सा !
आँखों में फैला एक धूआं सा ,
छांव की तलाश में है आँखें उनींदी ,
जाने कोई पकड़ ले वक़्त का हाथ    !!

शहद सी मीठी जीवन की आस ,
पर लम्हों से जुड़े है वक़्त की शाख़ ,
काल-दरिया में बहना न चाहूँ मैं ,
इश्क़ का मोहरा ग़र दे दे साथ   ॥ 

एकाकी जीवन रोशन कर ली मैंने ,
सूरज को आँचल में छुपाया है मैंने ,
चांदनी की छटा भी समेट लिया है ,
अमावस में बिखेरूँगी जगमगाता प्यार !!



सितंबर 05, 2013

सावन आयो रे.....















बादलों की गर्जना में
नीर भी है पीर भी
कौन से वो आंसू है वो !
खार भी है सार भी।। 

वेदना के अश्रु है या
शबनमी बूंदों का खेल
या धरा पर उतरती है
झर झर झरनों का बेल ॥  

गात,पात,घाट,बाट 
प्लावित तन छलछलात 
विरही हृदय छटपटाये 
प्रणय सुर स्मरण आये ॥ 

सप्तरंग रंग बिखेरे 
सावन संग-संग ले फेरे 
ग्रीष्म-ताप भी भीगे रे  
झूम के सावन आये  रे ॥ 



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