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मई 24, 2013

आज भारत है लज्जित.....

महान कविगुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित ये  कविता कितना  सटीक प्रतीत होता  है ..........
 

 आज भारत  है लज्जित
हीनता से सुसज्जित 
न  वो पौरुष न विचार 
न वो तप न सदाचार 
अंतर -बाह्य ,धर्मं -कर्म
सभी ब्रह्म विवर्जित 

हे रूद्र !!!!
धिक्कृत लांछित इस पृथ्वी पर 
सहसा करो बज्राघात 
हो जाये सब धूलिसात 
पर्वत-प्रांतर- नगर-गाँव 
जागे लेकर आपका नाम 
पुण्य-वीर्य-अभय-अमृत से 
धरा पल में हो सुसज्जित ॥ 

আজি এ ভারত লজ্জিত হে,
হীনতাপঙ্কে মজ্জিত হে
নাহি পৌরুষ, নাহি বিচারণা, কঠিন তপস্যা, সত্যসাধনা-
অন্তরে বাহিরে ধর্মে কর্মে সকলই ব্রহ্মবিবর্জিত হে ।।
ধিককৃত লাঞ্ছিত পৃথ্বী'পরে, ধূলিবিলুন্ঠিত সুপ্তিভরে-
রুদ্র, তোমার নিদারুণ বজ্রে করো তারে সহসা তর্জিত হে ।
পর্বতে প্রান্তরে নগরে গ্রামে জাগ্রত ভারত ব্রহ্মের নামে,
পুণ্যে বীর্যে অভয়ে অমৃতে হইবে পলকে সজ্জিত হে ।। 

 
 

जून 11, 2011

पिंजरे की चिड़िया


पिंजरे की चिड़िया थी           सोने के पिंजरे में
                 वन कि चिड़िया थी वन में
एकदिन हुआ                 दोनों का सामना
             क्या था विधाता के मन में

वन की चिड़िया कहे    सुन पंजरे की चिड़िया रे
         वन में उड़े दोनों मिलकर
पिंजरे की चिड़िया कहे        वन की चिड़िया रे
            पिंजरे में रहना बड़ा सुखकर

वन की चिड़िया कहे ना ......
   मैं पिंजरे में कैद रहूँ क्योंकर
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
     निकलूँ मैं कैसे पिंजरा तोड़कर

वन की चिड़िया गाये    पिंजरे के बाहर बैठे
          वन के मनोहर गीत
पिंजरे की चिड़िया गाये     रटाये हुए जितने
         दोहा और कविता के रीत

वन की चिड़िया कहे    पिंजरे की चिड़िया से
       गाओ तुम भी वनगीत
पिंजरे की चिड़िया कहे    सुन वन की चिड़िया रे
        कुछ दोहे तुम भी लो सीख

वन की चिड़िया कहे ना ...........
     तेरे सिखाये गीत मैं ना गाऊं
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय!
     मैं कैसे वनगीत गाऊं

वन की चिड़िया कहे    नभ का रंग है नीला
      उड़ने में कहीं नहीं है बाधा
पिंजरे की चिड़िया कहे    पिंजरा है सुरक्षित
      रहना है सुखकर ज्यादा

वन की चिड़िया कहे   अपने को खोल दो
      बादल के बीच, फिर देखो
पिंजरे की चिड़िया कहे   अपने को बांधकर
     कोने में बैठो, फिर देखो

वन की चिड़िया कहे ना.......
     ऐसे में उड़ पाऊँ ना रे
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय
     बैठूं बादल में मैं कहाँ रे

ऐसे ही दोनों पाखी    बातें करे रे मन की
     पास फिर भी ना आ पाए रे
पिंजरे के अन्दर से     स्पर्श  करे रे मुख से
         नीरव आँखे सबकुछ कहे रे

दोनों ही एक दूजे को     समझ ना पाए रे
        ना खुद को  समझा पाए रे
दोनों अकेले ही       पंख फड़फड़आये
        कातर कहे पास आओ रे 

वन की चिड़िया कहे ना............
      पिंजरे का द्वार हो जाएगा रुद्ध 
पिंजरे की चिड़िया कहे हाय 
   मुझमे शक्ति नही है उडूं खुद
गुरुदेव रविन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित काव्य का काव्यानुवाद 

मई 26, 2010

विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

सूर्य-तारा से भरा हुआ असमान
ये विश्व जिसमे भरा है प्राण
इन सबके साथ मैंने भी पाया है अपना स्थान
आश्चर्य से पुलकित हो गया प्राण

इस सीमाहीन प्राणों के तरंगों पर
भुवन झूमता है जिस ज्वार-भाटा पर
रगों में बह रही रक्त धारा में
प्रतीत होता है अपनापन

वन के राह पर जाते हुए
जिन घासों पर कदम रखा
फूलों के खुशबुओं से चमक उठा मन
मन हुआ है मतवारा
फैला चारों ओर आनंद-गान
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

आँख और कान को धरती पर बिछाया
धरती के सीने में अपने प्राण को उडेला
"जाना " से "अनजाना" का संधान मिला
विस्मय से जागृत हुआ ये प्राण

अप्रैल 29, 2010

निविड़ घन अँधेरे में................


निविड़ घन अँधेरे में जल रहा है ध्रुवतारा 
रे मेरे मन इन पत्थरों में  न होना दिशाहारा 
विषादों में डूबकर गुनगुनाना बंद मत कर 
अपने जीवन को सफल कर ले तोड़कर मोहकारा 
रखना बल जीवन में चिर-आशा हृदय में 
शोभायमान इस धरती पर बहे प्यार कि धारा 
संसार के इस सुख-दुःख में चलते रहना हँसते हुए 
हृदय में सदा भर के रखना उनका सुधा धारा

अप्रैल 25, 2010

विश्व जब है निद्रा- मग्न गगन है अन्धकार


विश्व जब है निद्रा- मग्न गगन है अन्धकार 

कौन ही जो मेरे वीणा के तार पर छेड़ा है झंकार 

नयनों से नींद लिया हर उठ-बैठूं शयन छोड़कर 
आँखे बिछाए प्रतीक्षा करूँ उसे न देख पाऊँ   
मन में मचा है हाहाकार 

गुन-गुन-गुन-गुन गीत से प्राण है भर गया 
न जाने कौन सा विपुल वाणी व्याकुल स्वर से बजाया 
कौन सी ये वेदना समझ न आये 
अश्रुधारा से भर गया हृदय ये 
किसे मैं पहनाओं ये मेरा कंठहार 

बैसाख

आँखों में मेरी है तृष्णा
और ये तृष्णा है संपूर्ण हृदय में
मैं हूँ वृष्टि-विहीन वैसाख के दिन
संतप्त प्राण लगा है जलने

तपता वायु से आंधी उठाता
मन को सुदूर शून्य कि ओर दौड़ाता
अवगुंठन को उड़ाता , मै हूँ वैसाख के दिन तपता- तपाता

जो फूल कानन को करता था आलोकित
वो फूल सूखकर हो गया कला कलुषित(हाय)

झरना को बाधित है किसने किया
निष्ठुर  पाषाण से अवारोधित किसने किया
दुःख के शिखर पर किसने है बिठाया
मैं हूँ बैसाख  के दिन तपता- तपाया

अप्रैल 23, 2010

प्रेम

ये व्याकुल वकुल के फूलों पर भ्रमर मरता पथ घूम-घूम कर
आसमान में ये कैसी सुगबुगाहट वायू मे भी एक फुसफुसाहट
ये वनांचल भी पुलकित होकर झूमे ये भ्रमर भी पथ भूलकर घूमे

ये मन वेदना सुमधुर होकर खुश है आज भुवन में बहकर

वंशी में है तानपुरी सी माया ये कौन है जो मेरे मन को चुराया
ये निखिल विश्व भी मरे घूम-घूम कर और मै मरुँ विरह सागर के तट पर

मेरी वीणा ने कौन ने ये कौन सा सुर बजाया

मेरी वीणा ने ये कौन सा सुर बजायाये क्या नव चंचल छंद  है जो है मन को भाया
ये कौन अशान्त चंचल तरुण है आया ये किसका वासनांचल उड़-उड़ के छाया

ये अलौकिक नृत्य है किसने किया वन-वनांतर अधीर आनंद से मुखरित हुआ
मेरी वीणा ने ये कौन सा सुर बजाया कि वो चंचल तरुण मन में समाया

इस अम्बर प्रांगन  में निस्वर मंजीर गूंज रही है
ये अनसुना सा ताल पर पल्लव पुंज करताली बजा रही है


ये किसके पदचाप सुनाने की है  आशा
 त्रिन-त्रिन को है अर्पण उस पदचाप की भाषा
ये कौन से  वन-गंध से समीरण है बंधनहारा

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