समर्थक

जुलाई 22, 2017

दरवाज़ों की भी ....



हर दर के दरवाज़ों की भी अपनी कहानी होती है
कहीं बूढ़े सिसकते मिलते है और कहीँ जवानी रोती है

आंगन-खिड़की है फिर भी दरवाज़ों का अपना खम है
कोई हाथ पसारे बाहर है कोई बाँह फैलाये अंदर है

हर दरवाजे के अंदर जाने कितनी जानें बसतीं हैं
बच्चे बूढ़े और जवानों की खूब रवानी रहती  है

सूरते हाल पूछो उनसे जिसे दर दर ठोकरें ही है मिले
दरवाजे बने हैं हर घर में पर 'खुले' नसीबांओं  को मिले 

जुलाई 12, 2017

गद्दारों सम्भल जाओ ....








गद्दारों सम्भल जाओ 
तुम न अब चल पाओगे 
जुल्म तुम्हारा खत्म हुआ 
अब पब्लिक से पिट जाओगे 

चाहे जितने पत्थर फेंको 
चला लो गोली सीने पे 
मर मिटेंगे अपने मुल्क पर
या शत्रुओं को छलनी कर देंगे 

भ्र्ष्ट राजनेताओं को 
जड़ से हम उखाड़ेंगे 
दहशतगर्दों को सरेआम 
पेड़ों पर लटकायेंगे 

नापाक़ खून से पाक़ ज़मीं को 
अब नहीं रंगने  देंगे 
दुश्मनों के घर में घुसकर 
उनको कफ़न ओढ़ाएंगे 


जुलाई 05, 2017

गुहार



















प्रिये अब तुम दूर न जाना

        आँखें पथ है निहार रही
        वो दिन न रहा वो रात न रही
        उलझी कब से है लटें सारी
        सुलझाओ आकर ओ सजना

सच सारे तो तुम साथ लिए
चल दिये ,मैं मिथ्या एक भरम
तुम हो यथार्थ- मैं  स्वप्न लिए
तथ्यों से परे हूँ खड़ी चिर-दिन 

      यूँ जाना कुछ खल सा गया
      तुम से जीवन का सार प्रिये
      वो दिन भी रहा वो रात भी रही
      बस यादों का संसार लिए 

जून 16, 2017

हाथों में मेहंदी .....


हाथों में मेहंदी जो लगा ली
अब पल्लू को सँभालूँ कैसे
भारी-भरकम पाजेब पहने
चुपके से मिलने आऊँ कैसे
अजीब है इश्क़ की फितरत
करने को है हजार बातें
सामने तुम और ये लब ख़ामोश
ज़ुबाँ पे ताला पड़ा हो जैसे
रात बेरात आँखे जगती है
समां बांधती है तुम्हारा ख़याल
गुफ्तगू एक तुम्हीं से है 
तुम्हीं से है हज़ारों सवाल 
मेहंदी की बातें मेहँदी ही जाने 
उफ्फ  कोई तरीका तो हो 
मिलूं  तुमसे पर पाजेब के 
ज़ुबाँ पे ताला लगा तो दो  

मई 06, 2017

जीना सिखा दे













ऐ ज़िन्दगी मुझे जीना सिखा दे
अपनों से बिछड़ कर भी खुश होना सिखा दे 
आइने में बसा है जो यादों का डेरा 
उस आईने से अपनों का चेहरा मिटा  दे

हर शख्स खुदगर्ज़  है हर चेहरा नकली
उन चेहरों को ढूंढ़ रही हूँ जो बनते थे असली
बन जाऊँ  मैं  उन जैसा ये चाहत तो नहीं 
इनके साथ जीने का सबक सिखा दे 

मुझसे ये मुखौटा न पहना गया 
असली नकली चेहरे न पहचाना गया 
दुःख के दिन जब भी मेरे सामने आये 
तनहा छोड़ के चले गए उनसे रुका न गया 





मई 02, 2017

गांव का मकान









याद आता है ख़ूब वो गांव का मकान
वो खुली सी ज़मीन वो खुला आसमान
वो बड़ा सा आंगन और ऊंचा रोशनदान
वो ईंटों का छत और पतंगों की उड़ान
वो बचपन की शरारत नानी बाबा का दुलार
उस आंगन में मनता था छोटे बड़े त्योहार
बच्चों की किलकारियां और खुशियां हजार
कई रिश्तों का घर था वो था रिश्तों में प्यार
आज भी ज़हन में है बसा  वो घर
मिली थी जहाँ हमें दो जहां का प्यार

अप्रैल 20, 2017

अवध बनाम लखनऊ

अवध के शाम का गवाह बन के जियो
    नवाबों के शहर में नवाब बन के जियो
          
              भूलभुलैया में  तुम ढूँढ लो ये ज़िन्दगी
                      या तो 'पहले आप' के रिवाज़ में ही जियो


                  











    दोआब का शहर गोमती के गोद मे
             चिकनकारी में सज धज के तुम भी जियो

                       भजन और अजान से गूंजता है जो शहर
                              उस लखनपुर को दिल मे बसा के जियो

ब्लॉग आर्काइव

widgets.amung.us

flagcounter

free counters

FEEDJIT Live Traffic Feed