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सितंबर 18, 2017

किस्से बयाँ न हो पाता...



सारे किस्से बयाँ न हो पाता कभी
दिल के कब्र में हजार किस्से दफ़्न हैं


इतने करीब भी न थे कि बुला पाऊँ तुम्हें
इतने दूर भी न थे कि भुला पाऊँ तुम्हें


पुराने जख्मों से मिल गयी वाहवाही इतनी
कि अब उसे नये जख्मों की तलाश है


मेरी चाहत है मैं रातों को  रोया न करूं
या रब मेरी इस चाहत को तो पूरा कर दे


कई नाम मौजूद है इस दिले गुलिस्तान में
धड़क जाता है दिल ये बस तुम्हारे नाम से


मैं कुछ इस तरह ग़म की आदत से तरबतर
कि ग़म होगा गर ख़ुशी आये मिलने मुझसे 

सितंबर 13, 2017

ख्वाव तेरे किरचियाँ बन ...



ख़्वाब तेरी किरचियाँ बन आँखों को अब चुभने लगी
गम की आँधियाँ इस तरह ख्वाबों के धूल उड़ा गए


मंज़िल पास थी रास्ता साफ था दो कदम डग भरने थे
गलतफहमी की ऐसी हवा चली सारे रास्ते धुंधला गए


बड़े शिद्दत से फूलों में बहार-ए-जोबन आयी थी
वक्त के साथ मिरे गजरे के सारे फूल मुरझा गए


मुहब्बत का दम भरने को दिल ने न चाहा फिर भी
बादल,चाँद, सितारे आँखों के आगे लहरा गये

सितंबर 10, 2017

मेरी धड़कनों से..










मेरी  धड़कनों से वो ज़िंदा ...  जो हुई
ज़िंदा हुई
 क्या मुझ पे ही वो बरस पड़ी!!

देख लिया इस शहर को  जो करीब से
बोल दिया असलियत तो भीड़ उबल पड़ी !!

सम्भाला ही था आईने को सौ जतन से
काफ़िये में तंग हुई उलझन में हूँ पड़ी !!

ख़ुदाया तूने मुझको जो काबिल न बनाया
कर आसाँ फ़िलवक्त इम्तिहान की घड़ी !!

गिर पड़ा मैं अपने गुनाहों के बोझ से 
मैं नशे में हूँ ये वहम खामखाँ पड़ी !!

सितंबर 04, 2017

मशहूर हो गए


ज़िन्दगी से कुछ इतने क़रीब हुए
कि आईने से भी  हम अजनबी हुए

रोशनी जो आँखों की नजर थी
दिखाया नहीं कुछ जो बत्ती गुल हुए

आ पँहुचे है ऐसी जहाँ में हम
ना ख़ुशी से ख़ुश औ' ना ग़म से ग़म

सभी रास्तें  मिल जाते है जहाँ
उस जगह से रास्तों सा अलग हुए

अच्छे-बुरे,सही-गलत पहचान न सके
मिले सबसे इस कदर कि मशहूर हो गए 

जुलाई 22, 2017

दरवाज़ों की भी ....



हर दर के दरवाज़ों की भी अपनी कहानी होती है
कहीं बूढ़े सिसकते मिलते है और कहीँ जवानी रोती है

आंगन-खिड़की है फिर भी दरवाज़ों का अपना खम है
कोई हाथ पसारे बाहर है कोई बाँह फैलाये अंदर है

हर दरवाजे के अंदर जाने कितनी जानें बसतीं हैं
बच्चे बूढ़े और जवानों की खूब रवानी रहती  है

सूरते हाल पूछो उनसे जिसे दर दर ठोकरें ही है मिले
दरवाजे बने हैं हर घर में पर 'खुले' नसीबांओं  को मिले 

जुलाई 12, 2017

गद्दारों सम्भल जाओ ....








गद्दारों सम्भल जाओ 
तुम न अब चल पाओगे 
जुल्म तुम्हारा खत्म हुआ 
अब पब्लिक से पिट जाओगे 

चाहे जितने पत्थर फेंको 
चला लो गोली सीने पे 
मर मिटेंगे अपने मुल्क पर
या शत्रुओं को छलनी कर देंगे 

भ्र्ष्ट राजनेताओं को 
जड़ से हम उखाड़ेंगे 
दहशतगर्दों को सरेआम 
पेड़ों पर लटकायेंगे 

नापाक़ खून से पाक़ ज़मीं को 
अब नहीं रंगने  देंगे 
दुश्मनों के घर में घुसकर 
उनको कफ़न ओढ़ाएंगे 


जुलाई 05, 2017

गुहार



















प्रिये अब तुम दूर न जाना

        आँखें पथ है निहार रही
        वो दिन न रहा वो रात न रही
        उलझी कब से है लटें सारी
        सुलझाओ आकर ओ सजना

सच सारे तो तुम साथ लिए
चल दिये ,मैं मिथ्या एक भरम
तुम हो यथार्थ- मैं  स्वप्न लिए
तथ्यों से परे हूँ खड़ी चिर-दिन 

      यूँ जाना कुछ खल सा गया
      तुम से जीवन का सार प्रिये
      वो दिन भी रहा वो रात भी रही
      बस यादों का संसार लिए 

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