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अप्रैल 06, 2016

वो दिन बारिश के.....











याद है वो दिन बारिश के ?
जब भी निकले- छाते को बंद कर  -
लटकाए से घूमा करते थे -


भींगना था पर पानी में ही नही ,
तुम्हारे साथ बीते हुए पलों के
 बौछारों में -

सनसनाती हवाएं , सोंधी सी 
मिटटी की खुशबू , बताये देती थी ,
मौसम भींगा है -

बहुत देर तक - चुपचाप-जाते हुए 
लम्हों को देखा करते थे - कोशिश थी -
पकड़ने की-

वक्त अपने वक्त के हिसाब से -
वक्त दिखाकर चला गया-हम लम्हों -
को ढूँढ़ते रह गए -

रास्ते अब भी वहीं है -
बारिश के दिनों में भींगती हुई -      
बस दो हाथ अलग हुए ॥ 

मार्च 30, 2016

छुईमुई सी लम्हें ....










छुईमुई सी लम्हें 
खुश्बू से भरी वो यादें 
तेरे आने की आहट 
वो झूठ मूठ के वादे 

छुप-छुपके पीछे आना 
हाथों से आँखें ढकना 
पकडे जाने के डर  से 
दीवारों में छुप जाना 

तेरे खातिर जो दिल ये 
डोल -डोल फिरता था 
तुझसे ही जाने क्यों ये 
मुझको छिपाए फिरता था 

वो आँखें ढूंढती सी 
जो मुझपे ही फ़िदा थी 
पर तुम न जान पायी 
मुझे जान  से वो प्यारी थी 

धीरे से सामने आना 
आकर सीने से लिपटना 
लम्हों से गुज़ारिश थी ये 
धीरे धीरे सरकना 

यादों के बज़्म से ये
 कुछ चित्र बनाया मैंने 
पर लम्हों की फितरत है 
उसे छू न सका किसी ने 

कैसे समझाऊँ दिल को 
लहूलुहान है ये 
वो  अतीत के पल जो 
सूई चुभो जाती है 


जनवरी 31, 2016

लो पूरब से सूरज निकला ....










नन्हें पाँव रात आई 
आँखों में उतरी वो ऐसे 
मानो  कोई सपना है वो 
नींदे भर लायी हो जैसे 









पल-पल सपना हर पल अपना 
क्या है हकीक़त क्या है अपना 
सब कुछ जैसे छुई -मुई 
रात ढल न जाए ऐसे 










जब भी मैंने आँखें मूंदे 
चाँद की आह्ट सी आई 
मंथर गति समय ये गुजरे 
दिन के जैसे रात भी गयी 









प्रातः स्नात सम ये सूरज 
धीरे-धीरे नभ में फैला 
स्याह रात बन गयी कहानी 
लो पूरब से सूरज निकला 

अगस्त 06, 2015

भींगी हुई आँखों से.........












भींगी हुई आँखों से जाती हुई रातों ने ,
जाने क्या-क्या कह गयी उसने बातों बातों में ॥ 

बातें जो कह गयी चुपके से रातों ने , 
अश्कों ने लिख दिए लम्हों की ज़ुबानी ये ॥ 

अश्कों के बूंदों में डूबी हुई ज़िन्दगी , 
जाने कब सुबह हो और ये आँखें खुलें ॥ 

न रहे हम होश में ख़ामोश है ज़िन्दगी ,
आ बैठें पहलू में सुन लूं तेरी ख़ामोशी ॥ 

मैं भी अंजाना हूँ ,तू भी अंजानी है ,
अंजानी रातों का बस ये कहानी है ॥ 

जुलाई 25, 2015

रंग....फीका सा









हंसती हुई आँखों में जो प्यार का पहरा रहता है-
असल में उन आँखों के ज़ख्म गहरे होते है ||

जलती हुई लौ भी जो उजारा करे मजारों को-
सुना है उन मजारों को बड़ी तकलीफ होती है ||

दिल जो किसी के प्यार का जूनून लिए चलता है-
उन्हीं दिलों में धोखों के अफ़साने छुपे रहते है ||

रात जो लेकर आती है चांदनी की बौछारें -
उन्हीं रातों में अमावस की रात भी शामिल होती है ||

हवाओं में बहती हुई दिखते है जो प्यार के रंग-
उन्हीं रंगों में एक रंग फीका सा भी होता है ||


अप्रैल 11, 2015

सौ साल बाद........


सौ साल पहले भी मैंने तुम पर कविता रचा था
सौ साल बाद आज तुम पढ़ने आई II
आँखों की भाषा जो मैंने उस समय पढ़ लिया था
सौ साल बाद आज तुम कहने आई II

जिन आँखों को आंसुओं से  धोया था हमने
उस वक़्त को इशारों से रोका था जो हमने
धूप छाँव सी ज़िन्दगी में अब बचा ही क्या है ?
सौ साल बाद आज तुम रंग भरने आई II

सांस  लेने की आदत थी..... लेता रहा तक
सदियों से बरसों से आदतन जीता रहा अब तक
ख़ामोशी को बड़ी ही ख़ामोशी से आज जब गले लगाया
सौ साल बाद आज वो रिश्ता तुम आजमाने आई II





अप्रैल 07, 2015

लम्हा जब लकीरों में बंटा.......



 
          लम्हा जब लकीरों में बंटा
तो उस पार मैं खड़ा था
इस पार   तुम थी-

शायद मैं इस इंतज़ार में था 

कि ये दाग मिट जाए 
पर हो न सका !!

शायद तुम इस फ़िराक 
में थी कि  ये दाग पट जाए 
तो लांघने की नौबत न आये 

पर लम्हों को इन हरकतों का 

इल्म पहले से था शायद 
दाग गहराते चले गए 
और एक दूजे का हाथ 
पकड़ न पाये !!

अब भी लकीर के इस पार लम्हा 

यूं ही मूंह बांयें खड़ा है 
वक़्त के दाग को थामे 
हाथ पसारे अड़ा है 

मेरे कदम जमे है 

उन्हीं  लकीरों को पाटती हुई 
कहीं वो मेरे इंतज़ार में-
मिल जाएगी जागती हुई 

लम्हों से गुज़ारिश है 

ये बता दे की वो कहाँ मारेगी ?
जुनूँ - ए  -ज़िन्दगी जीतेगी या 
वक़्त हारेगी !!!!


मार्च 16, 2015

वो शख्स न मिला ••••••••


वो शख्स नहीँ मिला
जो आईना सा मुझे अक्स दिखाए
आंखोँ के कोरो में छुपी लालिमा मे
दिल का छुपा जख्म दिखाये

वो खुद्दारी ही थी
जो तेरी यादों से हमेशा जूझता रहा
अपने घर के दरो दीवार मेँ हीं
अपने साये को टटोलता रहा

वो मैं ही था
जो वफा पे वफा किए जा रहा था
बिना कसूर के  बरसों से ये दिल
ज़माने का ज़ख़्म लिए जा रहा था

वो बारिश न मिली
जो झरने सा तन भिगो सके
मन के अन्दर के तूफाँ को
दरिया सा राह दिखा सके












अक्तूबर 05, 2014

रेत से घर नहीं बनता..........


रेत  से घर नहीं बनता 
पानी में ख्वाव नहीं बहते 
मन के अन्तर्निहित गहराई 
किसी पैमाने से नहीं नपते 

नए कोपलों में दिखता है 
पौधों की हरियाली की चाहत 
फूलों से भरी है गुलशन पर 
कलिओं को खिलने से नहीं राहत 

देह के नियम है अजीब 
थकता नहीं है सांस लेने में 
नींद में बुनते है ख्वाब सारे 
उम्मीदें टूटती है खुले आँखों से 

चराचर प्रकृति का नियम यही 
विरोधाभास सृष्टि का चलन है 
जो प्रवाह करे शिला खंड-खंड 
वो प्रवाहिनी नीर जीवन है 

समय के काल-खंड में 
जाने कौन सा रहस्य है छुपा 
कितने ही रंगों और ऋतुओं से 
धरित्री तुम हो अपरूपा 



जून 27, 2014

नया अध्याय तू पढ़



सांस जब तक चल रही है 
तुम भी  ज़िंदा हो पथिक
तुम अकेले ही नहीं हो -
चॉंद  तारे भी सहित

पाँव के नीचे जो धरती है 
वो राह दिखलाये
मोह माया त्याग दे 
कहीं ये न तुझे भरमाये

दंश भूखे पेट की 
तुझको समझना है अभी
बेघरों का आशियाना 
तुझको बनना है अभी

शून्य में ही भ्रमण करना 
नहीं है नियति तेरा
काल-कवलित सूव्यवस्था-
जीवंत करना है अभी

दिशाहीन तुम यूँ न भटको 
करो चुनौती स्वीकार
हिम्मत करो ऐ राहगीर 
लहरों से डरना है बेकार

मोतियों को सीपियों से 
ढूंढ लाना है कठिन
पर ये मोतियाँ क्या मिलता -
है नहीं बाज़ार मे

प्रबल झञ्झावात का भी 
सामना करते है खग
नीड़ पुनः निर्माण हेतु 
ढूँढ ही लेते तृण-पत्र

हिला दे सागर की गहराई 
वो हिम्मत तुम मे है
हुंकार गूँजे दस दिशाओं में 
वो गर्जन तुम में है

बेसहारों का सहारा 
बन ही जाओ रे पथिक
लक्ष्य को पाना सरल गर 
ठान लो मन मे तनिक

कर्म करना है निरंतर 
फल की चिंता है कहाँ
अनचाहा या मनचाहा 
परिणाम डरना है कहाँ

बंधन अनैतिकता का तोड़ 
चिंतन-मनन से नाता जोड़
अतीत के विष को वमन कर 
नया अध्याय तू पढ़






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