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अप्रैल 10, 2014

चुनना है खास



 ये लोकतंत्र है  या वोटतन्त्र !!
है त्रस्त  जनता और भ्रष्ट मंत्री 
नहीं देश प्रेम है  गुंडों का राज 
जनता के हाथ  कब आये राज II 

प्रशासन है यूं… मौन क्यों 
हत्याएं और लूटपाट यूं 
क्यों हो रहे यूं सरे आम 
अधीन मंत्री हो ,राजा अवाम II 

शायद फिर हो सुशासन  की आस 
 हो जाए दूर दिल की खटास 
चहुँओर देश का हो विकास 
ऐसे किसी को  चुनना है खास II 

"जय हिन्द"

अप्रैल 08, 2014

नारी!! तुम ही....


तुम अनन्या तुम लावण्या
तुम नारी सुलभ लज्जा से आभरणा
तुम सहधर्मिनी तुम अर्पिता
तुम पूर्ण नारीश्वर गर्विता



उत्तरदायित्वों की तुम निर्वाहिनी
तुम ही पुरुष की चिरसंगिनी
तुम सौन्दर्य बोध से परिपूर्णा
तुम से ही धरित्री आभरणा



तुम ही स्वप्न की कोमल कामिनी
तुमसे सजी है दिवा औ'यामिनी
शिशु हितार्थ पूर्ण जगत हो तुम
गृहस्थ की परिपूर्णता हो तुम



तुमसे ये धरा है चञ्चला
जननी रूप मे तुम निर्मला
कभी कठोर पाषाण हृदय से रंजित
कभी करूणामयी हृदय विगलित


कभी तुम अतसि-रूपसी सौन्दर्या
कभी हुंकारित रण-वीरांगना
हे नारी!! तुम ही सृष्टिकर्ता
तुमसे ही सम्भव पुरुष-प्रकृति वार्ता


चित्र गूगल साभार


अप्रैल 04, 2014

वसंत न जाना तुम !!


आसमान का रंग हो आज चाहे  फीका 
आज बारिश भी न कर पाये तन को गीला 
फूल चाहे आज खिले अधखिले से 
पर आज तुम मिले 
आज ही वसंत !! 


चाहे मैं बस न पाऊँ तुम्हारी यादों में 
मेरा पूर्ण प्रेम न मिले इतिहासों में 
मेरा तुम्हारा प्रणय है समय से परे 
नयन भर देखा तुम्हे
 आज ही आया वसंत !! 


चाहे दिन हो कितने ही घन से भरा 
चाहे सावन बारिश से भर दे ये धरा 
हाथ पकड़ कर हम तुम यूं ही निकल पड़े 
आज हम नहीं एकाकी 
वसंत है दिन-रात्रि  !!


मेरे स्वप्न को कोई सुने -ना-सुने 
शब्द उसे दूंगी चाहे लय न बंधे 
ह्रदय आक्रान्त हो चाहे कितने ग़मों से
मेरे स्वप्न द्रष्टा हो तुम 
वसंत न जाना तुम !!










मार्च 30, 2014

फागुन का रंग





पाखी उड़ जा रे 
बहती हवा में महकी फ़िज़ा में, 
कल-कल बहती सरित-झरनों में, 
शीत का अंत है ये !!!

पीले हरे फूलों के रंग- 

पलाश-ढाक के पत्तों के संग,
भ्रमर गुंजायमान,वसंत के ढंग,
फागुन का रंग है ये !!!!

प्रेम-प्लावित ह्रदय अनुराग; 

आह्लादित मन  गाये विहाग; 
ऋतुराज ने छेड़ा वसंत राग- 
फागुन का दंश है ये !!!!

तारों भरा गगन रजनीकर-

तारक-दल-दीपों से उज्जवल, 
नभ पर जगमग जलता प्रतिपल 
फागुन का गगन है ये !!!

पाखी तेरा नीड़  सघन;  

डाली-डाली शाखा उपवन; 
सुखी तेरा संसार निज-जन- 
फागुन का बयार है ये !!!





मार्च 22, 2014

जीवन कथा



अकेला ये मन सोचे हरदम
सुख-दुख का झमेला जीवन
मारे दंश फिर भी सहे जाये
यह ही है हृदय का दमखम ।।

नहीं कोई मरहम समय अति निर्मम
खारे आँसू भी न करे दर्द कम 
मन बहलाने को जीते है हम
देख कर ये धरा-प्रकृति का संगम ।।

आह! मुख से न निकले है कभी
मनुष्य है...ऐसे ही जीते है सभी
दुःख-सुख है पहिया जीवन का
जान लिया है दिल ने जी रहे है जब ही।।

पशु-पक्षी औ इस धरा के प्राणी
गत जीवन मे रची है कहानी
विकार नहीं संवेदना है ये
है हमने भी अब जीने की ठानी ।।








मार्च 12, 2014

रंगीन आखर



स्याही सी है ज़िन्दगी
लिखती मिटाती उकेरती
कुछ भी ये कह जाती
कागज़ों पर बसती ज़िन्दगी

रंगीन सपनों को कहती
सुख-दुःख में है उलझाती
पाती या फिर हो फ़साना
सुलझाती है ये ज़िन्दगी

सादा कागज़ सा ये मन
उस पर  ये रंगीन आखर
जाने क्यों नहीं छिपता है
बयाँ हो जाती ज़िंदगी

अफ़साने कितने अधूरे
अनसुने राज़ गहरे
आइना है ये कागज़
आखर बनके ये उभरे

फ़रवरी 27, 2014

विविधा


ईश्वरीय प्रेम। …।
जग में है सब अपने
मुक्ताकाश , पंछी , सपने
सुगन्धित धरती ,निर्झर झरने
आह्लादित तन मन
प्रेमदान का स्वर्गीय आनंद।।

प्रकृति चित्रण। ………
धरा,सरिता,औ' नील गगन
प्रस्फुटित पुष्प,वसंत आवागमन,
दारुण ग्रीष्म,शीत,और हेमंत
खग कलरव - गुंजायमान दिक्-दिगंत,
प्रकृति से परिपूर्णता का आनंद।।

प्रेम की विसंगतियां .......
जनमानस से परिपूर्ण इस जग में
एकाकीत्व का आभास रग - रग में
रहता है ये  आतुर मन प्रतीक्षारत
एकाकीत्व लगे अपना सा ।



दिसंबर 20, 2013

मन कोयला.....

मन कोयला बन जल राख  हुई 
धूआं उठा जब इस दिल  से 
 तेरा ही नाम लिखा फिर भी 
              हवा ने , बड़े जतन से 


        तेरी याद मन के कोने से 
        रह-रह कर दिल को भर जाए 
        जिन आँखों में बसते थे तुम 
              उन आँखों को रुला जाए 


जाने क्यों दिल की बस्ती में 
है आग लगी ,दिल जाने ना,
अंतस पीड़ा की ज्वाला भी 
जलता जाए बुझ पाए ना 

            नितांत अकेला सा ये दिल 
            शब्दों से भी छला जाए
             टूट कर बिखरे पल ये 
             हाथों से क्यों छूटा जाए ?

सौगात -ए - ग़म न माँगा था 
इश्क़-ए -दुनिया के दामन से 
जो भी मिला  सर आँखों पर 
कुछ इस मन से कुछ उस मन से 
             

नवंबर 24, 2013

blog का Total pageview

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इस blog का  Total pageview  एक लाख के ऊपर पहुंच गया है।   इस    ब्लॉग के सभी पाठकों को अजस्र  धन्यवाद। आशा है आगे भी आप सब का आशीर्वाद यूं ही प्राप्त करती रहूँगी। मेरे पुराने पोस्ट से  एक रचना पेश है। 


(1)
चाँद खिला पर रौशनी नही आयी
रात बीती पर दिन न चढ़ा
अर्श से फर्श तक के सफ़र में
कमबख्त रौशनी तबाह हो गयी। 
(2)
दिल की हालत कुछ यूं बयान हुई
कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा
राह-ए-उल्फत का ये नजराना है जालिम
न वो तुझे मिला न वो मुझे मिला  ।




नवंबर 15, 2013

शाश्वत और साकार .........

Art Image




एक मुट्ठी धूप पसरा है छत पर
सोचती हूँ बादल का कोइ टुकड़ा ;
गर ढक ले इस सुनहरे धूप को,
तो क्या आँच आएगी इस आँच को !!

आभास हुआ ......
बादल तो नटखट है
उड़ जाएगा हवा के साथ
अटखेलियां  करता हुआ
पर धूप से बादल की मित्रता तो क्षणिक है,,
वायु  और घन का साथ प्रामाणिक है ;
अस्तित्व धूप का निर्विकार है,
जीवन रस सा शाश्वत और साकार है

धूप का आवागमन निर्बाध है
ग्रहण से क्षणिक साक्षात्कार है,
बस यूँ ही सृष्टि का चलाचल है
धूप, बादल, ग्रहण इसी का फलाफल है ।।















  

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