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जून 27, 2014

नया अध्याय तू पढ़



सांस जब तक चल रही है 
तुम भी  ज़िंदा हो पथिक
तुम अकेले ही नहीं हो -
चॉंद  तारे भी सहित

पाँव के नीचे जो धरती है 
वो राह दिखलाये
मोह माया त्याग दे 
कहीं ये न तुझे भरमाये

दंश भूखे पेट की 
तुझको समझना है अभी
बेघरों का आशियाना 
तुझको बनना है अभी

शून्य में ही भ्रमण करना 
नहीं है नियति तेरा
काल-कवलित सूव्यवस्था-
जीवंत करना है अभी

दिशाहीन तुम यूँ न भटको 
करो चुनौती स्वीकार
हिम्मत करो ऐ राहगीर 
लहरों से डरना है बेकार

मोतियों को सीपियों से 
ढूंढ लाना है कठिन
पर ये मोतियाँ क्या मिलता -
है नहीं बाज़ार मे

प्रबल झञ्झावात का भी 
सामना करते है खग
नीड़ पुनः निर्माण हेतु 
ढूँढ ही लेते तृण-पत्र

हिला दे सागर की गहराई 
वो हिम्मत तुम मे है
हुंकार गूँजे दस दिशाओं में 
वो गर्जन तुम में है

बेसहारों का सहारा 
बन ही जाओ रे पथिक
लक्ष्य को पाना सरल गर 
ठान लो मन मे तनिक

कर्म करना है निरंतर 
फल की चिंता है कहाँ
अनचाहा या मनचाहा 
परिणाम डरना है कहाँ

बंधन अनैतिकता का तोड़ 
चिंतन-मनन से नाता जोड़
अतीत के विष को वमन कर 
नया अध्याय तू पढ़






जून 13, 2014

बिंब



झरनों सा गीत गाता ये मन 
सरिता की कलकल मधुगान 
सृष्टि है.... अनादि-अनंत 
भावनाओं से भरा है ये प्राण 

वरदान है कण-कण में छुपा 
दुःख-वेदना से जग है भरा 
पर स्वर्ण जीवन से भरा है 
नदी-सागर और ये धरा 

गूंजता स्वर नील-नभ में 
मोरनी … नाचे वन  में 
गा  रहा है गीत ये मन 
देख प्रकृति की ये छटा 

सोंधी महक में है एक नशा 
चन्द्रमा का प्रेम है निशा 
स्वप्नमय है ये वसुंधरा 
दिन उजला रात है घना 

देख श्याम घन गगन में 
ह्रदय-स्पंदन.... बढे रे 
नृत्य करे मन मत्त क्षण में 
सुप्त नाड़ी भी जगे रे 

कल-कल सरित गुंजायमान 
नद नदी सागर प्रवाहमान 
पुष्प सज्जित है उपवन 
और धरित्री चलायमान  




जून 06, 2014

इशकनामा





जिस्मों से परे दो रूहों को-
मिलाता है इश्क़ 
जीते है साथ और जीने की ख़ुशी -
दिलाता है इश्क़ 

प्रेम दरिया में डूबकर भी प्यासा 

रह जाता है इश्क़ 
समंदर सी गहराई औ नदी सा-
मीठा पानी है इश्क़ 

बादल गरजे तो बूँद बन जिस्म 

भिगोती है इश्क़ 
प्रेम-ज्वार परवान तो चढ़े पर भाटा
 न आने दे इश्क़ 

अनहद-नाद-साज़ प्रेम-गह्वर से 

प्रतिध्वनित है इश्क़ 
मंदिरों में घंटी सी बजे और मस्जिदों में
 अजान है इश्क़ 

इश्क़ इंसान से हो या वतन से मिटने को 

तैयार रहता  है इश्क़ 
ख़ुश्बुओं से ग़र पहचान होती गुलाब की 
शोख रवानी है इश्क़ 

ख्यालों में सवालों में.....जवाब ढूंढ

 लाती है इश्क़ 
  आसमान रंग बदले चाहे पड़ता नहीं 
फीका रंग-ए-इश्क़ 

सिमट जायेगी ये दुनिया गर मिट जाए 

नामों निशां-ए-इश्क़ 
बीज जो पनपते ही रंग दे दुनिया वो
 खूबसूरत तस्वीर है इश्क़ 











अप्रैल 27, 2014

लम्हों में जीती रही....












पत्तों के हिलने मे तेरे आने की आहट सुनूँ 
तुम मेरे शहर मे आये तुमसे मिलने का ख्वाब बुनूं ||

शाम ढलने लगी  चिरागों से बात करने लगी 
तुम्हारे आने की इंतज़ार मे लम्हा-लम्हा पिघलती रही  ||

वफ़ा-ए -इश्क़ की कौन सी तस्वीर है ये 
तेरे पाँव के निशाँ  मे ही अपना वज़ूद ढूंढ़ती रही ||

मेरी सिसकियाँ शायद तुम तक न पहुँच पाया अभी
लम्हा कतरा-कतरा पिघलता रहा मै लम्हों में जीती रही ||







चित्र  गूगल साभार 

अप्रैल 10, 2014

चुनना है खास



 ये लोकतंत्र है  या वोटतन्त्र !!
है त्रस्त  जनता और भ्रष्ट मंत्री 
नहीं देश प्रेम है  गुंडों का राज 
जनता के हाथ  कब आये राज II 

प्रशासन है यूं… मौन क्यों 
हत्याएं और लूटपाट यूं 
क्यों हो रहे यूं सरे आम 
अधीन मंत्री हो ,राजा अवाम II 

शायद फिर हो सुशासन  की आस 
 हो जाए दूर दिल की खटास 
चहुँओर देश का हो विकास 
ऐसे किसी को  चुनना है खास II 

"जय हिन्द"

अप्रैल 08, 2014

नारी!! तुम ही....


तुम अनन्या तुम लावण्या
तुम नारी सुलभ लज्जा से आभरणा
तुम सहधर्मिनी तुम अर्पिता
तुम पूर्ण नारीश्वर गर्विता



उत्तरदायित्वों की तुम निर्वाहिनी
तुम ही पुरुष की चिरसंगिनी
तुम सौन्दर्य बोध से परिपूर्णा
तुम से ही धरित्री आभरणा



तुम ही स्वप्न की कोमल कामिनी
तुमसे सजी है दिवा औ'यामिनी
शिशु हितार्थ पूर्ण जगत हो तुम
गृहस्थ की परिपूर्णता हो तुम



तुमसे ये धरा है चञ्चला
जननी रूप मे तुम निर्मला
कभी कठोर पाषाण हृदय से रंजित
कभी करूणामयी हृदय विगलित


कभी तुम अतसि-रूपसी सौन्दर्या
कभी हुंकारित रण-वीरांगना
हे नारी!! तुम ही सृष्टिकर्ता
तुमसे ही सम्भव पुरुष-प्रकृति वार्ता


चित्र गूगल साभार


अप्रैल 04, 2014

वसंत न जाना तुम !!


आसमान का रंग हो आज चाहे  फीका 
आज बारिश भी न कर पाये तन को गीला 
फूल चाहे आज खिले अधखिले से 
पर आज तुम मिले 
आज ही वसंत !! 


चाहे मैं बस न पाऊँ तुम्हारी यादों में 
मेरा पूर्ण प्रेम न मिले इतिहासों में 
मेरा तुम्हारा प्रणय है समय से परे 
नयन भर देखा तुम्हे
 आज ही आया वसंत !! 


चाहे दिन हो कितने ही घन से भरा 
चाहे सावन बारिश से भर दे ये धरा 
हाथ पकड़ कर हम तुम यूं ही निकल पड़े 
आज हम नहीं एकाकी 
वसंत है दिन-रात्रि  !!


मेरे स्वप्न को कोई सुने -ना-सुने 
शब्द उसे दूंगी चाहे लय न बंधे 
ह्रदय आक्रान्त हो चाहे कितने ग़मों से
मेरे स्वप्न द्रष्टा हो तुम 
वसंत न जाना तुम !!










मार्च 30, 2014

फागुन का रंग





पाखी उड़ जा रे 
बहती हवा में महकी फ़िज़ा में, 
कल-कल बहती सरित-झरनों में, 
शीत का अंत है ये !!!

पीले हरे फूलों के रंग- 

पलाश-ढाक के पत्तों के संग,
भ्रमर गुंजायमान,वसंत के ढंग,
फागुन का रंग है ये !!!!

प्रेम-प्लावित ह्रदय अनुराग; 

आह्लादित मन  गाये विहाग; 
ऋतुराज ने छेड़ा वसंत राग- 
फागुन का दंश है ये !!!!

तारों भरा गगन रजनीकर-

तारक-दल-दीपों से उज्जवल, 
नभ पर जगमग जलता प्रतिपल 
फागुन का गगन है ये !!!

पाखी तेरा नीड़  सघन;  

डाली-डाली शाखा उपवन; 
सुखी तेरा संसार निज-जन- 
फागुन का बयार है ये !!!





मार्च 22, 2014

जीवन कथा



अकेला ये मन सोचे हरदम
सुख-दुख का झमेला जीवन
मारे दंश फिर भी सहे जाये
यह ही है हृदय का दमखम ।।

नहीं कोई मरहम समय अति निर्मम
खारे आँसू भी न करे दर्द कम 
मन बहलाने को जीते है हम
देख कर ये धरा-प्रकृति का संगम ।।

आह! मुख से न निकले है कभी
मनुष्य है...ऐसे ही जीते है सभी
दुःख-सुख है पहिया जीवन का
जान लिया है दिल ने जी रहे है जब ही।।

पशु-पक्षी औ इस धरा के प्राणी
गत जीवन मे रची है कहानी
विकार नहीं संवेदना है ये
है हमने भी अब जीने की ठानी ।।








मार्च 12, 2014

रंगीन आखर



स्याही सी है ज़िन्दगी
लिखती मिटाती उकेरती
कुछ भी ये कह जाती
कागज़ों पर बसती ज़िन्दगी

रंगीन सपनों को कहती
सुख-दुःख में है उलझाती
पाती या फिर हो फ़साना
सुलझाती है ये ज़िन्दगी

सादा कागज़ सा ये मन
उस पर  ये रंगीन आखर
जाने क्यों नहीं छिपता है
बयाँ हो जाती ज़िंदगी

अफ़साने कितने अधूरे
अनसुने राज़ गहरे
आइना है ये कागज़
आखर बनके ये उभरे

लिखिए अपनी भाषा में

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