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जून 16, 2017

हाथों में मेहंदी .....


हाथों में मेहंदी जो लगा ली
अब पल्लू को सँभालूँ कैसे
भारी-भरकम पाजेब पहने
चुपके से मिलने आऊँ कैसे
अजीब है इश्क़ की फितरत
करने को है हजार बातें
सामने तुम और ये लब ख़ामोश
ज़ुबाँ पे ताला पड़ा हो जैसे
रात बेरात आँखे जगती है
समां बांधती है तुम्हारा ख़याल
गुफ्तगू एक तुम्हीं से है 
तुम्हीं से है हज़ारों सवाल 
मेहंदी की बातें मेहँदी ही जाने 
उफ्फ  कोई तरीका तो हो 
मिलूं  तुमसे पर पाजेब के 
ज़ुबाँ पे ताला लगा तो दो  

मई 06, 2017

जीना सिखा दे













ऐ ज़िन्दगी मुझे जीना सिखा दे
अपनों से बिछड़ कर भी खुश होना सिखा दे 
आइने में बसा है जो यादों का डेरा 
उस आईने से अपनों का चेहरा मिटा  दे

हर शख्स खुदगर्ज़  है हर चेहरा नकली
उन चेहरों को ढूंढ़ रही हूँ जो बनते थे असली
बन जाऊँ  मैं  उन जैसा ये चाहत तो नहीं 
इनके साथ जीने का सबक सिखा दे 

मुझसे ये मुखौटा न पहना गया 
असली नकली चेहरे न पहचाना गया 
दुःख के दिन जब भी मेरे सामने आये 
तनहा छोड़ के चले गए उनसे रुका न गया 





मई 02, 2017

गांव का मकान









याद आता है ख़ूब वो गांव का मकान
वो खुली सी ज़मीन वो खुला आसमान
वो बड़ा सा आंगन और ऊंचा रोशनदान
वो ईंटों का छत और पतंगों की उड़ान
वो बचपन की शरारत नानी बाबा का दुलार
उस आंगन में मनता था छोटे बड़े त्योहार
बच्चों की किलकारियां और खुशियां हजार
कई रिश्तों का घर था वो था रिश्तों में प्यार
आज भी ज़हन में है बसा  वो घर
मिली थी जहाँ हमें दो जहां का प्यार

अप्रैल 20, 2017

अवध बनाम लखनऊ

अवध के शाम का गवाह बन के जियो
    नवाबों के शहर में नवाब बन के जियो
          
              भूलभुलैया में  तुम ढूँढ लो ये ज़िन्दगी
                      या तो 'पहले आप' के रिवाज़ में ही जियो


                  











    दोआब का शहर गोमती के गोद मे
             चिकनकारी में सज धज के तुम भी जियो

                       भजन और अजान से गूंजता है जो शहर
                              उस लखनपुर को दिल मे बसा के जियो

फ़रवरी 18, 2017

अंक में ले लो........















माँ मुझको तुम अंक में ले लो
स्नेह फुहार से मुझे भिंगो दो
जब भी मुझको भूख लगे माँ
सीने से मुझको लगा लो
सीने को निचोड़ के तुमने
जो मुझको अमृत है पिलाया
उस अमृत का स्वाद आज भी
किसी भोजन में मैंने नहीं पाया
मेरे अंक में मेरा बच्चा
तेरी याद दिलाता है माँ
मुझको फिर से अंक में भर लो
तेरा अंक ही मेरा ठिकाना

अगस्त 23, 2016

पिघलते क़तरों में..........



पिघलते क़तरों में जो लम्हा है जीया
उन लम्हों की क़सम मैंने ज़हर है पीया -

कोई वादा नहीं था इक़रार-ए-बयाँ  का
कानों से उतर के वो दिल में बसा था ॥

अश्क़ों से लबालब ये वीरान सी आँखें
ग़म की ख़ुमारी और बोझल सी रातें -

दीदार-ए-यार कभी सुकूँ-ए-दिल था
देके दर्दे इश्क़ तेरे साथ ही चला था ॥

नालिश जो थी तेरे लिए तेरे ही खातिर
बयाँ न हो पाया वो अहसास गुज़र गया -

दरों दीवार जो दो दिलों का था आशियाना
मजार-ए-इश्क़ आज वहीँ पे दफ़न है  ॥ 

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