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जुलाई 25, 2015

रंग....फीका सा









हंसती हुई आँखों में जो प्यार का पहरा रहता है-
असल में उन आँखों के ज़ख्म गहरे होते है ||

जलती हुई लौ भी जो उजारा करे मजारों को-
सुना है उन मजारों को बड़ी तकलीफ होती है ||

दिल जो किसी के प्यार का जूनून लिए चलता है-
उन्हीं दिलों में धोखों के अफ़साने छुपे रहते है ||

रात जो लेकर आती है चांदनी की बौछारें -
उन्हीं रातों में अमावस की रात भी शामिल होती है ||

हवाओं में बहती हुई दिखते है जो प्यार के रंग-
उन्हीं रंगों में एक रंग फीका सा भी होता है ||


अप्रैल 11, 2015

सौ साल बाद........


सौ साल पहले भी मैंने तुम पर कविता रचा था
सौ साल बाद आज तुम पढ़ने आई II
आँखों की भाषा जो मैंने उस समय पढ़ लिया था
सौ साल बाद आज तुम कहने आई II

जिन आँखों को आंसुओं से  धोया था हमने
उस वक़्त को इशारों से रोका था जो हमने
धूप छाँव सी ज़िन्दगी में अब बचा ही क्या है ?
सौ साल बाद आज तुम रंग भरने आई II

सांस  लेने की आदत थी..... लेता रहा तक
सदियों से बरसों से आदतन जीता रहा अब तक
ख़ामोशी को बड़ी ही ख़ामोशी से आज जब गले लगाया
सौ साल बाद आज वो रिश्ता तुम आजमाने आई II





अप्रैल 07, 2015

लम्हा जब लकीरों में बंटा.......



 
          लम्हा जब लकीरों में बंटा
तो उस पार मैं खड़ा था
इस पार   तुम थी-

शायद मैं इस इंतज़ार में था 

कि ये दाग मिट जाए 
पर हो न सका !!

शायद तुम इस फ़िराक 
में थी कि  ये दाग पट जाए 
तो लांघने की नौबत न आये 

पर लम्हों को इन हरकतों का 

इल्म पहले से था शायद 
दाग गहराते चले गए 
और एक दूजे का हाथ 
पकड़ न पाये !!

अब भी लकीर के इस पार लम्हा 

यूं ही मूंह बांयें खड़ा है 
वक़्त के दाग को थामे 
हाथ पसारे अड़ा है 

मेरे कदम जमे है 

उन्हीं  लकीरों को पाटती हुई 
कहीं वो मेरे इंतज़ार में-
मिल जाएगी जागती हुई 

लम्हों से गुज़ारिश है 

ये बता दे की वो कहाँ मारेगी ?
जुनूँ - ए  -ज़िन्दगी जीतेगी या 
वक़्त हारेगी !!!!


मार्च 16, 2015

वो शख्स न मिला ••••••••


वो शख्स नहीँ मिला
जो आईना सा मुझे अक्स दिखाए
आंखोँ के कोरो में छुपी लालिमा मे
दिल का छुपा जख्म दिखाये

वो खुद्दारी ही थी
जो तेरी यादों से हमेशा जूझता रहा
अपने घर के दरो दीवार मेँ हीं
अपने साये को टटोलता रहा

वो मैं ही था
जो वफा पे वफा किए जा रहा था
बिना कसूर के  बरसों से ये दिल
ज़माने का ज़ख़्म लिए जा रहा था

वो बारिश न मिली
जो झरने सा तन भिगो सके
मन के अन्दर के तूफाँ को
दरिया सा राह दिखा सके












अक्तूबर 05, 2014

रेत से घर नहीं बनता..........


रेत  से घर नहीं बनता 
पानी में ख्वाव नहीं बहते 
मन के अन्तर्निहित गहराई 
किसी पैमाने से नहीं नपते 

नए कोपलों में दिखता है 
पौधों की हरियाली की चाहत 
फूलों से भरी है गुलशन पर 
कलिओं को खिलने से नहीं राहत 

देह के नियम है अजीब 
थकता नहीं है सांस लेने में 
नींद में बुनते है ख्वाब सारे 
उम्मीदें टूटती है खुले आँखों से 

चराचर प्रकृति का नियम यही 
विरोधाभास सृष्टि का चलन है 
जो प्रवाह करे शिला खंड-खंड 
वो प्रवाहिनी नीर जीवन है 

समय के काल-खंड में 
जाने कौन सा रहस्य है छुपा 
कितने ही रंगों और ऋतुओं से 
धरित्री तुम हो अपरूपा 



जून 27, 2014

नया अध्याय तू पढ़



सांस जब तक चल रही है 
तुम भी  ज़िंदा हो पथिक
तुम अकेले ही नहीं हो -
चॉंद  तारे भी सहित

पाँव के नीचे जो धरती है 
वो राह दिखलाये
मोह माया त्याग दे 
कहीं ये न तुझे भरमाये

दंश भूखे पेट की 
तुझको समझना है अभी
बेघरों का आशियाना 
तुझको बनना है अभी

शून्य में ही भ्रमण करना 
नहीं है नियति तेरा
काल-कवलित सूव्यवस्था-
जीवंत करना है अभी

दिशाहीन तुम यूँ न भटको 
करो चुनौती स्वीकार
हिम्मत करो ऐ राहगीर 
लहरों से डरना है बेकार

मोतियों को सीपियों से 
ढूंढ लाना है कठिन
पर ये मोतियाँ क्या मिलता -
है नहीं बाज़ार मे

प्रबल झञ्झावात का भी 
सामना करते है खग
नीड़ पुनः निर्माण हेतु 
ढूँढ ही लेते तृण-पत्र

हिला दे सागर की गहराई 
वो हिम्मत तुम मे है
हुंकार गूँजे दस दिशाओं में 
वो गर्जन तुम में है

बेसहारों का सहारा 
बन ही जाओ रे पथिक
लक्ष्य को पाना सरल गर 
ठान लो मन मे तनिक

कर्म करना है निरंतर 
फल की चिंता है कहाँ
अनचाहा या मनचाहा 
परिणाम डरना है कहाँ

बंधन अनैतिकता का तोड़ 
चिंतन-मनन से नाता जोड़
अतीत के विष को वमन कर 
नया अध्याय तू पढ़






जून 13, 2014

बिंब



झरनों सा गीत गाता ये मन 
सरिता की कलकल मधुगान 
सृष्टि है.... अनादि-अनंत 
भावनाओं से भरा है ये प्राण 

वरदान है कण-कण में छुपा 
दुःख-वेदना से जग है भरा 
पर स्वर्ण जीवन से भरा है 
नदी-सागर और ये धरा 

गूंजता स्वर नील-नभ में 
मोरनी … नाचे वन  में 
गा  रहा है गीत ये मन 
देख प्रकृति की ये छटा 

सोंधी महक में है एक नशा 
चन्द्रमा का प्रेम है निशा 
स्वप्नमय है ये वसुंधरा 
दिन उजला रात है घना 

देख श्याम घन गगन में 
ह्रदय-स्पंदन.... बढे रे 
नृत्य करे मन मत्त क्षण में 
सुप्त नाड़ी भी जगे रे 

कल-कल सरित गुंजायमान 
नद नदी सागर प्रवाहमान 
पुष्प सज्जित है उपवन 
और धरित्री चलायमान  




जून 06, 2014

इशकनामा





जिस्मों से परे दो रूहों को-
मिलाता है इश्क़ 
जीते है साथ और जीने की ख़ुशी -
दिलाता है इश्क़ 

प्रेम दरिया में डूबकर भी प्यासा 

रह जाता है इश्क़ 
समंदर सी गहराई औ नदी सा-
मीठा पानी है इश्क़ 

बादल गरजे तो बूँद बन जिस्म 

भिगोती है इश्क़ 
प्रेम-ज्वार परवान तो चढ़े पर भाटा
 न आने दे इश्क़ 

अनहद-नाद-साज़ प्रेम-गह्वर से 

प्रतिध्वनित है इश्क़ 
मंदिरों में घंटी सी बजे और मस्जिदों में
 अजान है इश्क़ 

इश्क़ इंसान से हो या वतन से मिटने को 

तैयार रहता  है इश्क़ 
ख़ुश्बुओं से ग़र पहचान होती गुलाब की 
शोख रवानी है इश्क़ 

ख्यालों में सवालों में.....जवाब ढूंढ

 लाती है इश्क़ 
  आसमान रंग बदले चाहे पड़ता नहीं 
फीका रंग-ए-इश्क़ 

सिमट जायेगी ये दुनिया गर मिट जाए 

नामों निशां-ए-इश्क़ 
बीज जो पनपते ही रंग दे दुनिया वो
 खूबसूरत तस्वीर है इश्क़ 











अप्रैल 27, 2014

लम्हों में जीती रही....












पत्तों के हिलने मे तेरे आने की आहट सुनूँ 
तुम मेरे शहर मे आये तुमसे मिलने का ख्वाब बुनूं ||

शाम ढलने लगी  चिरागों से बात करने लगी 
तुम्हारे आने की इंतज़ार मे लम्हा-लम्हा पिघलती रही  ||

वफ़ा-ए -इश्क़ की कौन सी तस्वीर है ये 
तेरे पाँव के निशाँ  मे ही अपना वज़ूद ढूंढ़ती रही ||

मेरी सिसकियाँ शायद तुम तक न पहुँच पाया अभी
लम्हा कतरा-कतरा पिघलता रहा मै लम्हों में जीती रही ||







चित्र  गूगल साभार 

अप्रैल 10, 2014

चुनना है खास



 ये लोकतंत्र है  या वोटतन्त्र !!
है त्रस्त  जनता और भ्रष्ट मंत्री 
नहीं देश प्रेम है  गुंडों का राज 
जनता के हाथ  कब आये राज II 

प्रशासन है यूं… मौन क्यों 
हत्याएं और लूटपाट यूं 
क्यों हो रहे यूं सरे आम 
अधीन मंत्री हो ,राजा अवाम II 

शायद फिर हो सुशासन  की आस 
 हो जाए दूर दिल की खटास 
चहुँओर देश का हो विकास 
ऐसे किसी को  चुनना है खास II 

"जय हिन्द"

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