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जनवरी 31, 2016

लो पूरब से सूरज निकला ....










नन्हें पाँव रात आई 
आँखों में उतरी वो ऐसे 
मानो  कोई सपना है वो 
नींदे भर लायी हो जैसे 









पल-पल सपना हर पल अपना 
क्या है हकीक़त क्या है अपना 
सब कुछ जैसे छुई -मुई 
रात ढल न जाए ऐसे 










जब भी मैंने आँखें मूंदे 
चाँद की आह्ट सी आई 
मंथर गति समय ये गुजरे 
दिन के जैसे रात भी गयी 









प्रातः स्नात सम ये सूरज 
धीरे-धीरे नभ में फैला 
स्याह रात बन गयी कहानी 
लो पूरब से सूरज निकला 

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