मैंने इस सादगी ए ज़िन्दगी से पल्ला झाड़ लिया
ज़िन्दगी की सच्चाई ने मुझमें कटुता भर दिया
जिस किरदार को हमने बड़े मासूमियत से संजोया
उसकी बचपने में लोगों ने जहर है घोल दिया
बड़ी इत्मिनान की नींद कभी सोया करते थे हम
नींद की गलियारे में कभी सरपट दौड़ा करते थे हम
मन के किसी कोने में गर अंधेरा छा जाता था कभी
अपने बुलन्द हौसलों से रोशनी भर देते थे हम
अब तो घर में कोई नसीहत देने वाला भी नहीं रहा
बड़े-बूढ़ों का साया भी सर के ऊपर से निकल गया
कोशिश कर रहा हूँ इस दुनिया की गहराई को नाप लूँ
ऊपरवाले की कारीगरी की मीन मेख पहचान लूँ
लगता है इसी ऊहापोह में ये ज़िन्दगी भी गुज़र जाएगी
कि कत्ले सादगी-मासूमियत से ज़िंदगी सँवर जाएगी