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नवंबर 09, 2017

हद है

अश्कों को आँखों का ठौर पसन्द नहीं
उसे पूरी दुनिया से है वास्ता, हद है

कर भी लूँ नींदों से वाबस्ता
ख़्वाब बन जाता है हरजाई हद है
 
रिंदो साक़ी ने झूम के पिलाया जो
घूँट पानी का न उतरा हद है


कर ली खूब मेहमाननवाज़ी भी हमने
हुए फिर भी बदनाम हद है

दो दिन ज़िन्दगी के चांदनी के चार दिन
बाकी ज़िन्दगी है सियापा हद है

ताश के पत्ते मानिंद बिखर जाता है घर
जो न सम्भाला तिनका भी हद है

कर ली थी मैंने इश्क़ से तौबा
उफ़्फ़ तेरी ये आंखें हद है

ये दिल भी बड़ा कमज़र्फ निकला
जान के भी इश्क़ ए दस्तूर हद है

सितंबर 04, 2017

मशहूर हो गए


ज़िन्दगी से कुछ इतने क़रीब हुए
कि आईने से भी  हम अजनबी हुए

रोशनी जो आँखों की नजर थी
दिखाया नहीं कुछ जो बत्ती गुल हुए

आ पँहुचे है ऐसी जहाँ में हम
ना ख़ुशी से ख़ुश औ' ना ग़म से ग़म

सभी रास्तें  मिल जाते है जहाँ
उस जगह से रास्तों सा अलग हुए

अच्छे-बुरे,सही-गलत पहचान न सके
मिले सबसे इस कदर कि मशहूर हो गए 

अगस्त 23, 2016

पिघलते क़तरों में..........



पिघलते क़तरों में जो लम्हा है जीया
उन लम्हों की क़सम मैंने ज़हर है पीया -

कोई वादा नहीं था इक़रार-ए-बयाँ  का
कानों से उतर के वो दिल में बसा था ॥

अश्क़ों से लबालब ये वीरान सी आँखें
ग़म की ख़ुमारी और बोझल सी रातें -

दीदार-ए-यार कभी सुकूँ-ए-दिल था
देके दर्दे इश्क़ तेरे साथ ही चला था ॥

नालिश जो थी तेरे लिए तेरे ही खातिर
बयाँ न हो पाया वो अहसास गुज़र गया -

दरों दीवार जो दो दिलों का था आशियाना
मजार-ए-इश्क़ आज वहीँ पे दफ़न है  ॥ 

नवंबर 24, 2013

blog का Total pageview

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इस blog का  Total pageview  एक लाख के ऊपर पहुंच गया है।   इस    ब्लॉग के सभी पाठकों को अजस्र  धन्यवाद। आशा है आगे भी आप सब का आशीर्वाद यूं ही प्राप्त करती रहूँगी। मेरे पुराने पोस्ट से  एक रचना पेश है। 


(1)
चाँद खिला पर रौशनी नही आयी
रात बीती पर दिन न चढ़ा
अर्श से फर्श तक के सफ़र में
कमबख्त रौशनी तबाह हो गयी। 
(2)
दिल की हालत कुछ यूं बयान हुई
कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा
राह-ए-उल्फत का ये नजराना है जालिम
न वो तुझे मिला न वो मुझे मिला  ।




अगस्त 12, 2013

अकेले चले थे.....














अकेले चले थे , तन्हां सफ़र था
मुसाफिर मिले जो... राहें जुदा थी 
लम्बी सी सड़कें और दिन पिघले-पिघले 
तन्हाई के जाने ये आलम कौन सी ?

पेड़ों के  कतारों की बीच की पगडण्डी 
कब से न जाने खड़ी है अकेली 
सुनसान राहें... न क़दमों की आहट 
इंतजार है उसको भी न जाने किसकी !!

बस सूखे पत्तों की गिरने की आहट 
बारिश की टप-टप चिड़ियों की चहचहाहट 
दाखिल हो जाता हूँ अक्सर इस सफ़र में 
है झींगुर के शोर औ पत्तों की सरसराहट !!

कब तक मैं समझाऊँ  इस तन्हां  दिल को
नज्मों से बहलाए - फुसलाये पल को
तन्हाई का साथ छुडाना जो चाहूँ
भीड़ अजनबियों का नहीं भाता है मन को !!

गर कोई बिखरी सी नज़्म मिल जाए
कतरन-ए -ख्वाव पर पैर पड़ जाए
बज़्म-ए-याद से कुछ यादें  दरक जाए
तनहा जीने का फिर सबब मिल जाए  !!








नवंबर 27, 2012

नाराज़ आँखे


नाराज़ आँखे बोलती रही रातभर 
पर आंच न आया तुम पर -
रहे बेखबर !

सूखे पत्ते सी फडफडाती रही यूं ही 
और गीली आँखों ने चाँद -
सुखाया रातभर !

बुझी हुई आँखों से ज़िन्दगी को देखा इस कदर 
चलती हुई ज़िन्दगी को -
पकडती रही बस  रातभर !

काँटों से ख़्वाबों ने आँखों को खूब चुभोया है 
आंसुओं ने सहलाया है पर  -
उनींदे आँखों को रातभर !

शायद ज़िन्दगी की यही चाल है ---पता नहीं 
आंसूं और ख्वाब ने हंगामा -
मचाया है रातभर !

अप्रैल 27, 2012

ये धूप की बेला





ये धूप की बेला 
ये छांव सी ज़िन्दगी 
न चांदनी रात 
न सितारों से दिल्लगी 


जमी हूँ मै शिला पर -
बर्फ की तरह 
काटना है मुश्किल 
ये पहाड़ सी ज़िन्दगी 


थम जाती है साँसें
पलकें हो जाती है भारी
भरकर तेरी आहें 
आंसूं बहे है खारी


अनजाने अजनबी तुम 
 जीवन में यूं आये
हसीं ख्वाब मेरे 
तुमने यूं चुराए 

मन की चोर निगाहें 
ढूंढें परछाईं मेरी 
हवाओं की सरसराहट 
पैगाम लाती थी तेरी 

वो भूला सा शख्स 
ये यादों का बज़्म 
तेरी याद में लिख दिया 
ये दर्द भरा नज़्म 






फ़रवरी 08, 2012

पेड़ के ....


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पेड़ के पीछे से
झरनों के नीचे से
नदियों के किनारे से
बागियों के दामन से
पहाड़ों की ऊँचाई से
नाम तेरा पुकारूं


पेड़ो से टकराकर
झरनों से लिपटकर
नदियों से बलखाकर
बागियों को महकाकर
पहाडो की वादियों से
नाम तेरा गूंजे
तुझे कई बार सुनाई दे





नवंबर 14, 2011

वक़्त गुज़रा हुआ


तू है वक़्त गुज़रा हुआ 
मुरझाया फूल किताबों में रखा 
तुझे न याद करूँ एक पल से ज्यादा 
कि दिल में तू नहीं अब कोई और है 


तुम से खिला करती थी जो बगिया 
इंतज़ार में पल गिनता था ये छलिया 
अब उन लम्हों में खुशबू बिखेरा जिसने 
वो अब तुम नहीं कोई और है 


ख़्वाबों में, नींदों में, ख्यालों में नहीं तुम 
राह पर, मोड़ पर , धडकन में नहीं तुम 
अब रात गुज़रती है जिनके अरमान लिए 
वो अरमान नहीं तुम ..कोई और है 


वो जो है मेरी आज की ख्वाहिश 
उसका सदका उतार दूं न रहे खलिश 
बिछड़ने का डंक डसा था जिसने 
वो कोई और नहीं वो तू ही है 



जुलाई 10, 2011

तन्हाइयों में रोकर...


तन्हाइयों में रोकर दिल बहलाते है 
बिखरे ग़म को सिलकर ग़ज़ल बनाते है 

यादें जो तुमसे है जुड़ी वो अक्सर छेड़ जाते है 
तेरी यादों के बज़्म में हम खो जाते है 

शबनम का कतरा..... दरिया बनाती है 
आस तुमसे मिलने की किनारा दिखाती है 

शबनम के कतरे को यूं बेकार न समझो 
इस नासूर दिल को ये मरहम लगाती है 



जून 26, 2011

ज़िन्दगी से..........


ज़िन्दगी  से बस यूं ही
 चन्द बातें हुई
 चमन में आये बहार से
 एक मुलाकात हुई

 जलते चिरागों तले
 रोशनी नहीं होती
 चिराग  तले अँधेरे में
 ज़िन्दगी दीदार हुई

 हर तरफ भीड़ है
 हर शख्स है परेशान
इस दुनिया  में ज़िन्दगी
 तू ही है तनहा खडी

मई 24, 2011

मेरे ज़ख्मो को......





मेरे ज़ख्मो को सहलाने की कोशिश न करो 
मेंरे दर्द को बहलाने की साजिश  न करो 
मुझे तुमसे जो दर्दें  सौगात में मिली है 
उन पर मलहम लगाने  की ख्वाहिश न करो 

अश्कों को तो ... पी लिया मैंने 
रिश्ता जो था ... तोड़ लिया मैंने 
अब इन रिश्तो के दरार को 
प्यार  से भरने की कोशिश न करो 

आंसूओं  के समंदर में डूब गया जो दिल 
सपनो के खँडहर में दब गया जो पल 
तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने 
उस आशियाने को उजाड़ने.....आया मत करो 




मई 04, 2011

चादर पर पड़े .......


चादर पर पड़े सिलवटों की भी जुबां होती है
कभी प्यार तो कभी ग़म की कहानी कहती है


रेत गीली कर जाती है जो तूफ़ानी समंदर
वो समुंदर भी आंसुओं से ही नमकीन होती है


मिटटी की सोंधी खुशबू ने जिन फिज़ाओं को महकाया है
उन फिज़ाओं में ही  पतझड़ की कहानी होती है


पानी के बुलबुले को भूल से मुहब्बत मत समझो
इन बुलबुलों में बेवफाई की दास्ताँ होती है 

अप्रैल 30, 2011

कश्ती दरिया में………।


कश्ती दरिया में इतराए ये समझकर
दरिया तो अपनी है इठलाऊं इधर-उधर

किनारा तो है ही अपना ,ठहरने के लिए
दम ले लूंगा मै भटकूँ राह गर

पर उसे मालूम नही ये कमबख्त दरिया तो
किनारों को डुबो देता है सैलाब में

कश्ती को ये बात कौन बताये जालिम
ना दरिया अपनी न किनारा अपना

e sakhi radhike1.m...

मार्च 27, 2011

रैन जलती....


रैन जलती रही 
ख्वाब पलती रही 
आंसूओ के सैलाब से 
नैन सिलती रही 

सपने पले थे जो 
पलकों  पर ठहर सी गयी 
तारे भी आसमा पर ही 
जाने क्यों ठिठुर सी गयी 

दर्द भरी लोरिया भी 
आँखों को सुला न पाया 
सुबह का सूरज भी 
दुनिया सजा न पाया 

बारिश की बूंदे भी 
इस मन को न भर पाया 
ये प्रेम की तड़पन है 
न ये जल पाया न बुझ पाया 

फ़रवरी 21, 2011

आँखों से झांकते...........

             (1)
आँखों से झांकते हुए तुम दिल में उतर गए
हया का पर्दा है जो तुम्हे मुझसे है अलग करता
             (2)
तुम्हे पाने की आरज़ू ने मुझे दीवाना बना दिया
तुम्हारे प्यार को पाना मैंने मकसद बना लिया
तुम्हे न पाने से जो सूरत-ए-हाल होगा सनम
ये सोचना भी दिल गवारा नही करता

अक्टूबर 12, 2010

चढ़कर इश्क की


चढ़कर इश्क की कई मंजिले
अब ये समझ आया
इश्क के दामन में फूल भी है
और कांटे भी
और मेरे हाथ काँटों भरा
फूल आया
-------------
फूल सा इश्क पाकर
फूला न समाया
पर बेवफाई का काँटा हर फूल ने
ज़रूर चुभाया
----------------
अब तो मेरी हालत देख
दोस्त ये कहे
इश्क का तो यही ताकाज़ा है
तेरा दिल हर फूल पे
क्यों आया

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