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जुलाई 16, 2022

कबूतरों से.....

Kabutaron se chhin liya Gaya hai Uska kam 
berojgar kabutar ab Dane Dane Ko mohtaj Hai
कबूतरों से छीन लिया गया है उसका काम 
बेरोजगार कबूतर अब दाने-दाने को मोहताज है
© अनामिका 

जुलाई 14, 2022

वजूद

Tumse Behtar Tumhen Kaun Jaanta hai Bhala
 Apne vajud per bharosa kar lo
Tum sab se mukhtalif Ho na aitabar ho to
Apne Aaina Se jaakar poochh Lo
तुम से बेहतर तुम्हें कौन जानता है भला 
अपने वजूद पर भरोसा कर लो 
तुम सब से मुख़्तलिफ़ हो न एतबार हो तो 
अपने आईना से जाकर पूछ लो
©अनामिका

जुलाई 13, 2022

आशियाना...the home

Khwab nahin hai unche mahlon ka 
Jahan band darvaje aur khidkiyan ho paband 
mujhe chahie aashiyana un diwaron ka 
Jisme khuli Ho khidkiyan aur  bastaa ho Anand
ख्वाब नहीं है मुझे ऊंचे महलों का 
जहां बंद दरवाजा और खिड़कियां हो पाबंद 
मुझे चाहिए आशियाना उन दीवारों का
जिसमें खुली हो खिड़कियां और बसता हो आनंद 
© अनामिका 

अक्टूबर 24, 2019

समझ... ज़िन्दगी की

















ज़िन्दगी जी लिया हमने 
गमों को पी लिया हमने 
होश में हम जब आये
दिल को सी लिया हमने 

मैखाना भी ख़ाली था 
पैमाना भी ख़ाली था 
भरी थी जिन आंखों में इश्क़ 
वो निगाहें बड़ा सवाली था 

कहा दिल का भी मान लो
अपने जज़्बातों को थाम लो 
न करो सरेआम जख़्मों को 
ज़रा समझदारी से काम लो 


अप्रैल 09, 2018

सादगी ए ज़िन्दगी...

मैंने इस सादगी ए ज़िन्दगी से पल्ला झाड़ लिया
ज़िन्दगी की सच्चाई ने मुझमें कटुता भर दिया


जिस किरदार को हमने बड़े मासूमियत से संजोया
उसकी बचपने में लोगों ने जहर है घोल दिया


बड़ी इत्मिनान की नींद कभी सोया करते थे हम
नींद की गलियारे में कभी सरपट दौड़ा करते थे हम


मन के किसी कोने में गर अंधेरा छा जाता था कभी
अपने बुलन्द हौसलों से रोशनी भर देते थे हम


अब तो घर में कोई नसीहत देने वाला भी नहीं रहा
बड़े-बूढ़ों का साया भी सर के ऊपर से निकल गया


कोशिश कर रहा हूँ इस दुनिया की गहराई को नाप लूँ
ऊपरवाले की कारीगरी की मीन मेख पहचान लूँ


लगता है इसी ऊहापोह में ये ज़िन्दगी भी गुज़र जाएगी
कि कत्ले सादगी-मासूमियत से ज़िंदगी सँवर जाएगी

मार्च 16, 2018

समझदार हो चला.....


कभी समंदर तो कभी दरिया बन के
कभी आग तो कभी शोला बन के

ज़रूरतमंदों ने खूब गले लगाया था मुझे
काम आया हूँ मैं जाने कैसे कैसे उनके

पर अब मैं जो थोड़ा स्वार्थी बन गया हूँ
उन्हें नश्तर की तरह अब मैं चुभ रहा हूँ

सुनना  छोड़ दिया जब से उनका दर्दे फ़साना
तेवर उनके हो गए तल्ख़ अब गया वो ज़माना

खुदगर्ज़ बन के ही सही दिल को सुकूँ खूब मिला
बड़ा नादाँ था ये दिल परअब समझदार हो चला



नवंबर 12, 2017

शून्य काल










शून्य का मैं खोज हूँ 
शून्य का मैं ओज हूँ 
शून्य  के रथ पर सवार 
शून्य का मैं आज हूँ 

शून्य का कपाट हूँ 
शून्य सा विराट हूँ 
शून्य सा ही क्षुद्र मैं 
शून्य का ललाट हूँ 

अवसाद में है शून्यता 
विषाद में है शून्यता 
प्रसन्नता में शून्यता 
विपन्नता में शून्यता 

शून्य मेघ का गरज 
शून्य विद्युत सा लरज 
शून्य सूर्य सा है तप्त 
शून्य चंद्र सा है सर्द


शून्य सा प्रखर हूँ मैं
शून्य का शिखर हूँ मैं
शून्य सा हूँ मापदण्ड
शून्य सा मुखर हूँ मैं

शून्य का अलाप हूँ
शून्य का विलाप हूँ
शून्य का हूँ शब्दरूप
शून्य का संलाप हूँ

रात्रि शून्य में विलय
शून्य शनि का वलय
तारकों में टिमटिमाता
प्रकाश का महाप्रलय

शून्य में है स्तब्धता
शून्य में है क्षुब्धता
शून्य को विराम दो
कि शून्य में है गत्यता

शून्य मार्ग प्रशस्त कर
बाधाएं निरस्त कर
शत्रु को शिकस्त दे तू
धर्म को तदर्थ धर

आओ शून्य में चलें
आओ शून्य में ढलें
शून्य के आकाश में
हम ह्रस्व-दीर्घ पग भरें

नवंबर 09, 2017

हद है

अश्कों को आँखों का ठौर पसन्द नहीं
उसे पूरी दुनिया से है वास्ता, हद है

कर भी लूँ नींदों से वाबस्ता
ख़्वाब बन जाता है हरजाई हद है
 
रिंदो साक़ी ने झूम के पिलाया जो
घूँट पानी का न उतरा हद है


कर ली खूब मेहमाननवाज़ी भी हमने
हुए फिर भी बदनाम हद है

दो दिन ज़िन्दगी के चांदनी के चार दिन
बाकी ज़िन्दगी है सियापा हद है

ताश के पत्ते मानिंद बिखर जाता है घर
जो न सम्भाला तिनका भी हद है

कर ली थी मैंने इश्क़ से तौबा
उफ़्फ़ तेरी ये आंखें हद है

ये दिल भी बड़ा कमज़र्फ निकला
जान के भी इश्क़ ए दस्तूर हद है

सितंबर 18, 2017

किस्से बयाँ न हो पाता...



सारे किस्से बयाँ न हो पाता कभी
दिल के कब्र में हजार किस्से दफ़्न हैं


इतने करीब भी न थे कि बुला पाऊँ तुम्हें
इतने दूर भी न थे कि भुला पाऊँ तुम्हें


पुराने जख्मों से मिल गयी वाहवाही इतनी
कि अब उसे नये जख्मों की तलाश है


मेरी चाहत है मैं रातों को  रोया न करूं
या रब मेरी इस चाहत को तो पूरा कर दे


कई नाम मौजूद है इस दिले गुलिस्तान में
धड़क जाता है दिल ये बस तुम्हारे नाम से


मैं कुछ इस तरह ग़म की आदत से तरबतर
कि ग़म होगा गर ख़ुशी आये मिलने मुझसे 

सितंबर 13, 2017

ख्वाव तेरे किरचियाँ बन ...



ख़्वाब तेरी किरचियाँ बन आँखों को अब चुभने लगी
गम की आँधियाँ इस तरह ख्वाबों के धूल उड़ा गए


मंज़िल पास थी रास्ता साफ था दो कदम डग भरने थे
गलतफहमी की ऐसी हवा चली सारे रास्ते धुंधला गए


बड़े शिद्दत से फूलों में बहार-ए-जोबन आयी थी
वक्त के साथ मिरे गजरे के सारे फूल मुरझा गए


मुहब्बत का दम भरने को दिल ने न चाहा फिर भी
बादल,चाँद, सितारे आँखों के आगे लहरा गये

सितंबर 10, 2017

मेरी धड़कनों से..










मेरी  धड़कनों से वो ज़िंदा ...  जो हुई
ज़िंदा हुई
 क्या मुझ पे ही वो बरस पड़ी!!

देख लिया इस शहर को  जो करीब से
बोल दिया असलियत तो भीड़ उबल पड़ी !!

सम्भाला ही था आईने को सौ जतन से
काफ़िये में तंग हुई उलझन में हूँ पड़ी !!

ख़ुदाया तूने मुझको जो काबिल न बनाया
कर आसाँ फ़िलवक्त इम्तिहान की घड़ी !!

गिर पड़ा मैं अपने गुनाहों के बोझ से 
मैं नशे में हूँ ये वहम खामखाँ पड़ी !!

सितंबर 04, 2017

मशहूर हो गए


ज़िन्दगी से कुछ इतने क़रीब हुए
कि आईने से भी  हम अजनबी हुए

रोशनी जो आँखों की नजर थी
दिखाया नहीं कुछ जो बत्ती गुल हुए

आ पँहुचे है ऐसी जहाँ में हम
ना ख़ुशी से ख़ुश औ' ना ग़म से ग़म

सभी रास्तें  मिल जाते है जहाँ
उस जगह से रास्तों सा अलग हुए

अच्छे-बुरे,सही-गलत पहचान न सके
मिले सबसे इस कदर कि मशहूर हो गए 

जुलाई 22, 2017

दरवाज़ों की भी ....



हर दर के दरवाज़ों की भी अपनी कहानी होती है
कहीं बूढ़े सिसकते मिलते है और कहीँ जवानी रोती है

आंगन-खिड़की है फिर भी दरवाज़ों का अपना खम है
कोई हाथ पसारे बाहर है कोई बाँह फैलाये अंदर है

हर दरवाजे के अंदर जाने कितनी जानें बसतीं हैं
बच्चे बूढ़े और जवानों की खूब रवानी रहती  है

सूरते हाल पूछो उनसे जिसे दर दर ठोकरें ही है मिले
दरवाजे बने हैं हर घर में पर 'खुले' नसीबांओं  को मिले 

जुलाई 12, 2017

गद्दारों सम्भल जाओ ....








गद्दारों सम्भल जाओ 
तुम न अब चल पाओगे 
जुल्म तुम्हारा खत्म हुआ 
अब पब्लिक से पिट जाओगे 

चाहे जितने पत्थर फेंको 
चला लो गोली सीने पे 
मर मिटेंगे अपने मुल्क पर
या शत्रुओं को छलनी कर देंगे 

भ्र्ष्ट राजनेताओं को 
जड़ से हम उखाड़ेंगे 
दहशतगर्दों को सरेआम 
पेड़ों पर लटकायेंगे 

नापाक़ खून से पाक़ ज़मीं को 
अब नहीं रंगने  देंगे 
दुश्मनों के घर में घुसकर 
उनको कफ़न ओढ़ाएंगे 


जुलाई 05, 2017

गुहार



















प्रिये अब तुम दूर न जाना

        आँखें पथ है निहार रही
        वो दिन न रहा वो रात न रही
        उलझी कब से है लटें सारी
        सुलझाओ आकर ओ सजना

सच सारे तो तुम साथ लिए
चल दिये ,मैं मिथ्या एक भरम
तुम हो यथार्थ- मैं  स्वप्न लिए
तथ्यों से परे हूँ खड़ी चिर-दिन 

      यूँ जाना कुछ खल सा गया
      तुम से जीवन का सार प्रिये
      वो दिन भी रहा वो रात भी रही
      बस यादों का संसार लिए 

जून 16, 2017

हाथों में मेहंदी .....


हाथों में मेहंदी जो लगा ली
अब पल्लू को सँभालूँ कैसे
भारी-भरकम पाजेब पहने
चुपके से मिलने आऊँ कैसे
अजीब है इश्क़ की फितरत
करने को है हजार बातें
सामने तुम और ये लब ख़ामोश
ज़ुबाँ पे ताला पड़ा हो जैसे
रात बेरात आँखे जगती है
समां बांधती है तुम्हारा ख़याल
गुफ्तगू एक तुम्हीं से है 
तुम्हीं से है हज़ारों सवाल 
मेहंदी की बातें मेहँदी ही जाने 
उफ्फ  कोई तरीका तो हो 
मिलूं  तुमसे पर पाजेब के 
ज़ुबाँ पे ताला लगा तो दो  

मई 06, 2017

जीना सिखा दे













ऐ ज़िन्दगी मुझे जीना सिखा दे
अपनों से बिछड़ कर भी खुश होना सिखा दे 
आइने में बसा है जो यादों का डेरा 
उस आईने से अपनों का चेहरा मिटा  दे

हर शख्स खुदगर्ज़  है हर चेहरा नकली
उन चेहरों को ढूंढ़ रही हूँ जो बनते थे असली
बन जाऊँ  मैं  उन जैसा ये चाहत तो नहीं 
इनके साथ जीने का सबक सिखा दे 

मुझसे ये मुखौटा न पहना गया 
असली नकली चेहरे न पहचाना गया 
दुःख के दिन जब भी मेरे सामने आये 
तनहा छोड़ के गए उनसे रुका न गया 





मई 02, 2017

गांव का मकान









याद आता है ख़ूब वो गांव का मकान
वो खुली सी ज़मीन वो खुला आसमान
वो बड़ा सा आंगन और ऊंचा रोशनदान
वो ईंटों का छत और पतंगों की उड़ान
वो बचपन की शरारत नानी बाबा का दुलार
उस आंगन में मनता था छोटे बड़े त्योहार
बच्चों की किलकारियां और खुशियां हजार
कई रिश्तों का घर था वो था रिश्तों में प्यार
आज भी ज़हन में है बसा  वो घर
मिली थी जहाँ हमें दो जहां का प्यार

अप्रैल 20, 2017

अवध बनाम लखनऊ

अवध के शाम का गवाह बन के जियो
    नवाबों के शहर में नवाब बन के जियो
          
              भूलभुलैया में  तुम ढूँढ लो ये ज़िन्दगी
                      या तो 'पहले आप' के रिवाज़ में ही जियो


                  











    दोआब का शहर गोमती के गोद मे
             चिकनकारी में सज धज के तुम भी जियो

                       भजन और अजान से गूंजता है जो शहर
                              उस लखनपुर को दिल मे बसा के जियो

फ़रवरी 18, 2017

अंक में ले लो........















माँ मुझको तुम अंक में ले लो
स्नेह फुहार से मुझे भिंगो दो
जब भी मुझको भूख लगे माँ
सीने से मुझको लगा लो
सीने को निचोड़ के तुमने
जो मुझको अमृत है पिलाया
उस अमृत का स्वाद आज भी
किसी भोजन में मैंने नहीं पाया
मेरे अंक में मेरा बच्चा
तेरी याद दिलाता है माँ
मुझको फिर से अंक में भर लो
तेरा अंक ही मेरा ठिकाना

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