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नवंबर 30, 2010

दिन तो बदलते.........


दिन तो बदलते है
जीते है मरते है
अपनी इस दुनिया में
पल पल फिसलते है


क्षण-भंगुर ये काया
भटकाती है माया
मन के इस भटकन से
बारम्बार छलते है


चलायमान सांसो का
गतिमान इस धड़कन का
नश्वर इस काया से
मोहभंग होना है

सावन फिर आयेगा
बदरा फिर छाएगा
ऋतुओं को आना है
आकर छा जायेगा


मन के इस पंछी को
तन के इस पिंजरे में
सहलाकर रखना है
वर्ना उड़ जायेगा


रे बंधु सुन रे सुन
नश्वर इस काया की
माया में न पड़ तू
वर्ना पछतायेगा

17 टिप्‍पणियां:

  1. आध्यत्मिक दर्शन कराती कविता
    माया से बचेंगे तो ही पार पायेंगें

    उत्तर देंहटाएं
  2. चलायमान सांसो का
    गतिमान इस धड़कन का
    नश्वर इस काया से
    मोहभंग होना है

    ....गहन चिंतन से परिपूर्ण एक शास्वत सत्य को गहराई से रेखंकित करती एक सुन्दर प्रस्तुति..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर कविता ..
    कई रंगों को समेटे हुए...



    मुट्ठी भर आसमान...

    उत्तर देंहटाएं
  4. अना जी, बहुत ही सच्ची बात कही आपने इस कविता के माध्यम से. सुंदर प्रस्तुति .


    उपेन्द्र

    सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना

    उत्तर देंहटाएं
  5. अन्तरआत्मा को एक सन्देश देती रचना। उम्दा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. man ko to sab vash me rakhna chahte hai par man-panchi kahah vash me rahta hai?
    sundar bhavabhivyakti !

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut achcha likha aapne bhi aur aapne mere blog par comment kiya merijeevankatha.blogspot.com par.....
    thanx aur plz mera ek aur blog hai samratonlyfor.blogspot.com
    usko bhi dekhna aur plz comment karna

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक सन्देश देती रचना,सुंदर प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  9. जीवन के वास्तविक सत्यों का उद्घाटन किया है आपने ...बड़ी बारीकी से ...शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  10. खूब संभाला मन को फ़िर भी न जाने क्यूं ये उड़ने को करता है
    समझाया बहुत, फ़िर भी न जाने क्यूं माया में पड़ने को मरता है...

    उत्तर देंहटाएं
  11. खूब संभाला मन को फ़िर भी न जाने क्यूं ये उड़ने को करता है
    समझाया बहुत, फ़िर भी न जाने क्यूं माया में पड़ने को मरता है...

    उत्तर देंहटाएं
  12. रे बंधु सुन रे सुन
    नश्वर इस काया की
    माया में न पड़ तू
    वर्ना पछतायेगा


    जीवन के सत्य को लिखा है अपने .. सार्थक रचना ... पर इंसान समझ नही पाता इस बात को ...

    उत्तर देंहटाएं

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