(1)
चाँद खिला पर रौशनी नही आयी
रात बीती पर दिन न चढ़ा
अर्श से फर्श तक के सफ़र में
कमबख्त रौशनी तबाह हो गया
(2)
दिल की हालत कुछ यूं बयान हुई
कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा
राह-ए-उल्फत का ये नजराना है जालिम
न वो तुझे मिला न वो मुझे मिला
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हमने रखे हैं नक्शे पा आसमां के ज़मीं पर अब ज़मीं को आसमां बनने में देर न लगेगी टांग आयी हूँ सारे ग़म दरो दीवार के खूंटी पर अब वफ़ाओं...
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कदम से कदम मिलाकर देख लिया आसान नहीं है तेरे साथ चलना तुझे अपनी तलाश है मुझे अपनी मुश्किल है दो मुख़्तलिफ़ का साथ रहना यूँ तो तू दरिया और ...
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ये चीत्कार ! ये हाहाकार ! ये संहार !!! क्यों ? ये संत्रास ! ये परिहास ! सब बदहवास ! क्यों? ये वारदात ! ये मारकाट ! सब बरबाद...
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।
जवाब देंहटाएंरक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनाएँ .. बहुत प्यारी रचना है
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