मार्च 13, 2012

जिंदगीनामा



कई तहों में  ज़िन्दगी सिमटती चली जाती है 
जीवन ये ख़ामोशी से सलवटों में समां जाती है 
कल और आज के बीच का बंटवारा हो न सका 
कई टुकडो में ज़िन्दगी को खुरचती  चली जाती है 


तनहा गुज़र-बसर करना है इक नशा जीवन का 
फंदों के अक्स से खेलना है इक नशा प्रीतम का 
टुकड़ों में बँटी ज़िन्दगी को बुनते चले जाते है 
दरख्तों को आंसुओ से भरते चले जाते है 


मद्धिम सी रौशनी है तारो का जमघट है नहीं अब 
चाँद भी छोड़ चूका साथ ...उषा का स्वागत है अब 
हर रात चाँद और मै..... रिश्ते बुनते जाते है 
ज़िन्दगी के तहों से सलवटे हटाते जाते है 







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