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सितंबर 17, 2011

आँखों के .....


आँखों के सुरीले सपनो को 
यूं ही न बहने दो 
नींदों में बसते है सपने 
नींदों को यूं न उड़ने दो 

ज़मीन पे उतारो उन-
सपनों को ज़रा हौले से 
वक्त से मुखातिब हूँ मैं 
सपनों के मचलने से 

समय के गिरेबां में 
बाँधा था जिन लम्हों को 
तेरे ही पैरों के निशां
है उन लमही ख्वाबों पर 

तेरे कदमों के निशाँ 
मैं ढूँढता रहा हवाओं में 
ज़मीं पे,फलक पे,
गुलशन पे फिजाओं पे 

मिला वो- कहीं समय 
से परे जाकर , क्षितिज में 
छुपी थी वो समय के 
स्नेहिल आगोश में 

कभी अपनी आँखों से 
मेरे आँखों की भाषा पढ़ 
हकीकत को सपनों की 
तहज़ीब से ओढ़कर 

मेरे पलकों के नीचे भी 
उनींदे ख्वाब पलते है 
सुना वो अक्स भी 
तेरे  चहरे से मिलते है 

अब इन सुरीले सपनों को-
बहने मत दिया करो 
हो सकता है बह जाए 
मेरा अक्स...रहने दिया करो




16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पंक्तिया लिखी है बधाई

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  2. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 19-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  3. behtarin shabd, behtarin andaj,behatarin bhav..dil se likhi is rachna ne man ko moh liya..hardik badhayee

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरे पलकों के नीचे भी
    उनींदे ख्वाब पलते है
    सुना वो अक्स भी
    तेरे चहरे से मिलते है
    सशक्त रचना ,सम्प्रेश्निय्ता से भरपूर .

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने ..

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  6. सुंदर कविता . सराहनीय प्रस्तुतिकरण .आभार.

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  7. क्या सोंच है गजब वाह वाह ......

    उत्तर देंहटाएं
  8. मेरे पलकों के नीचे भी
    उनींदे ख्वाब पलते है
    सुना वो अक्स भी
    तेरे चहरे से मिलते है

    ख़्वाबों को सहेज कर रखा जाना उचित है। न जाने, जिंदगी के किस मोड़ पर उनकी जरूरत पड़ जाए।

    उत्तर देंहटाएं

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