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दिसंबर 24, 2012

वो चांदनी रात....


वो चांदनी रात हम और तुम 
फूलों से सजी बगिया उपवन 
वो सपनो का झूला वो सजन का साथ 
उन यादों को भूल न पाया ये मन !!


नभ पर था तारों की बारात 
मन में बसी प्रेम का प्रभात 
वो जगती आँखें और हमारा प्रेमालाप 
रहता थे हम प्रेम-मगन न भूला ये मन !!



वो पूनम की चाँद था हाथों में हाथ 
वो चांदनी रात में चले थे साथ 
छेड़ गए यूं मन वीणा के तार 
कहाँ भूल पाया ये मन ??


अब तो न वो दिन न वो रात 
एकाकी जीवन और विरह का भार 
दिया था तुम्हे जो प्रेम का उपहार 
कैसे बिछ्डेगा  तुमसे ये मन??

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना..
    कोमल भाव लिए...:-)

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 25/12/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रयास, बहुत बहुत बधाईयाँ ..सार्थक सकारात्मक सृजन मित्र ..

    उत्तर देंहटाएं

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