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जून 22, 2012

मित्रता दृढ़ता से धर !



















मन के तम को दूर कर 
गम को मन से परे कर 
हृदय से हृदय मिला ले 
आज मित्रता के गीत गा ले !

अग्निशापित हृदय से 
राग-द्वेष के कलंक से 
खुद को तू स्वतंत्र कर 
मित्रतादार्श स्थापित कर !



भेद मन का मिटा दे 
देह-नश्वर जान ले 
अश्रु बूँद न व्यर्थ कर 
मित्रता दृढ़ता से धर !

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना...
    :-)

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  4. मित्रता की ये धार यूँ ही बनी रहे

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  5. Shed all negative feelings and place the positivity in heart. Lovely poem!

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  6. के बारे में महान पोस्ट "मित्रता दृढ़ता से धर !"

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  7. बहुत सुंदर रचना अनामिका जी

    खुदा जो देता रहा मुश्किलें हरदम
    मेरा हौसला मेरी ताकत हो जाने वाले
    दोस्त भी उसने दिये साथ निभाने वाले

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