जनवरी 21, 2012

दिल की तरकीब



दिल की तरकीब खास कुछ काम न आ या
न दिल को मिला सुकून न मन को चैन आया


दिल लहूलुहान  हुआ आँखे रो रो कर रात काटे
चाहत आपने ही थी जताई  नाहक हमें बदनाम किया




कदमो को हमने है रोका नज़रों को समेटा है हमने 
ख़त के पुर्जे में भी आखर मिटाया है हमने 


उलझ रही है सीने में कोई नज़्म मिसरा या दोहा 
कोरे कागज़ पर लिखा नाम मिटाया है हमने 


रेत का महल ले डूबा समंदर और अब बारिश की बारी है  
ज़ख्मों का जो सिला दिया तूने वह सिलसिला अब भी जारी है 

  

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