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नवंबर 04, 2011

कोयल की कूक


गूंजे कोयल की कूक से
जंगल में मीठी तान
पवन चले मंद मंद
गाये दादुर गान ,


आम्र मंजरी के महक से
महके वन-वनांतर
पथिक का प्यास बुझाए
नदी बहे देश-देशांतर


पक्षियों के कलरव से
गूंजे धरती आसमान
पुष्प-पुष्प सुगंध से
महकाए ये जहान


बेशक ये बयार भी
हृदयों को मिलाये
पत्तों के झुरमुट से
चाँद भी झिलमिलाये 

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