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जुलाई 15, 2011

मन पंछी...


मन पंछी क्यों चाहे 
फुर-फुर-फुर उड़ जाऊं 
बैठूं उस बादल में 
सूरज को धर लाऊँ 

काली रात न आये 
दिन ही दिन छा जाए 
मन की कालिमा पर 
धूप ही धूप भर जाए 

दिन का उजाला तो 
मन के कालेपन को 
तिल-तिल कर छाटेगा
विश्वास है इस मन को 

मन फिर भी ये सोचे 
गर रात फिर न आये 
दिन की ज़रुरत को 
कैसे समझ पाए 

दिन-रात बहाना है 
जग को बताना है 
एक दूजे के बिन ये 
सब कुछ बेगाना है 



7 टिप्‍पणियां:

  1. एक की महत्ता का भान दूसरा दिलाता है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. रात और दिन दोनों का बराबर महत्व है।
    अच्छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 16/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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