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फ़रवरी 07, 2011

जाह्नवी हूँ .........


 मै नदी हूँ .............
पहाड़ो से निकली 
नदों से मिलती 
कठिन धरातल पर              
उफनती उछलती 
प्रवाह तरंगिनी हूँ 
                                   

परवाह किसे है 
ले चलती किसे मै 
रेट हो या  मिटटी   
न छोडूँ उसे मै 
तरल प्रवाहिनी हूँ 
                               
राह बनाती 
सागर जा मिलती 
 पर्वत से अमृत को 
लेकर मै चलती 
न आदि न अंत 
शिव जटा से प्रवाहित           
जाह्नवी हूँ 
                                      

16 टिप्‍पणियां:

  1. पर्वत से अमृत को
    लेकर मै चलती
    न आदि न अंत
    शिव जटा से प्रवाहित
    जाह्नवी हूँ
    बहुत सुन्दर भाव। बधाई इस रचना के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nice post.
    यदि आप 'प्यारी मां' ब्लॉग के लेखिका मंडल की सम्मानित सदस्य बनना चाहती हैं तो
    कृपया अपनी ईमेल आई डी भेज दीजिये और फिर निमंत्रण को स्वीकार करके लिखना शुरू
    करें.
    यह एक अभियान है मां के गौरव की रक्षा का .
    मां बचाओ , मानवता बचाओ .

    http://pyarimaan.blogspot.com/2011/02/blog-post_03.html

    उत्तर देंहटाएं
  3. राह बनाती
    सागर जा मिलती
    पर्वत से अमृत को
    लेकर मै चलती
    न आदि न अंत
    शिव जटा से प्रवाहित
    जाह्नवी हूँ

    Beautiful expression !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  4. राह बनाती
    सागर जा मिलती
    पर्वत से अमृत को
    लेकर मै चलती
    न आदि न अंत
    शिव जटा से प्रवाहित
    जाह्नवी हूँ

    बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर भाव्।
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर भाव। धन्यवाद|

    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत खूब लिखा है आपने...
    अति उत्तम!!!

    मेरा ब्लॉग भी देखे....
    http://nimhem.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  8. अत्यंत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. राह बनाती
    सागर जा मिलती
    पर्वत से अमृत को
    लेकर मै चलती
    न आदि न अंत
    शिव जटा से प्रवाहित
    जाह्नवी हूँ
    बहुत सुन्दर ..........

    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  10. मान गए भाई दमदार लेखनी है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. क्यूं भ्रम में रखते हैं आप
    शब्द आपके भी कम नहीं
    दिल सबका लुभाते
    हम तो यूँ ही लिख देते
    ख्याल जो जहन में आते
    निरंतर खुद को बहलाते
    कलम फिर भी आप जैसी
    चलती कहाँ
    Aapke comments ke liye dhanyawaad

    उत्तर देंहटाएं

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