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अप्रैल 19, 2011

गुहार

मेरे घर के आगे है पथरीली ज़मीन
हो सके तो आओ इन पत्थरों पर चलकर

पूनम की चाँद ने रोशनी की दूकान खोली है
खरीद लो रोशनी ज़िंदगी रोशन कर लो

गीली मिटटी है न चलो इतना
की कदमों के निशाँ को मिटा न पाऊँ
आखिर किसी को पता न चले
यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है



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