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अप्रैल 19, 2011

गुहार

मेरे घर के आगे है पथरीली ज़मीन
हो सके तो आओ इन पत्थरों पर चलकर

पूनम की चाँद ने रोशनी की दूकान खोली है
खरीद लो रोशनी ज़िंदगी रोशन कर लो

गीली मिटटी है न चलो इतना
की कदमों के निशाँ को मिटा न पाऊँ
आखिर किसी को पता न चले
यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है



12 टिप्‍पणियां:

  1. "किसी को पता न चले
    यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है"

    बहुत ही बढ़िया.

    सादर

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  2. मेरे घर के आगे है पथरीली ज़मीन
    हो सके तो आओ इन पत्थरों पर चलकर

    bahut sundar

    उत्तर देंहटाएं
  3. पूनम की चाँद ने रोशनी की दूकान खोली है
    खरीद लो रोशनी ज़िंदगी रोशन कर लो

    अच्छी पंक्तियाँ हैं|

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  4. वाह ! जी,
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  5. bahut khoob...inhi pattharon pe chal kar chalo aa sako to aao,mere ghar ke raaste mein koyi kahkashan nahin hai...

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  6. आखिर किसी को पता न चले
    यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है

    बहुत बढ़िया!
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. किसी को पता न चले
    यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है"
    bahut khoob

    मेरे घर के आगे है पथरीली ज़मीन
    हो सके तो आओ इन पत्थरों पर चलकर
    man ko bha gayi .

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  8. अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

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