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अगस्त 12, 2013

अकेले चले थे.....














अकेले चले थे , तन्हां सफ़र था
मुसाफिर मिले जो... राहें जुदा थी 
लम्बी सी सड़कें और दिन पिघले-पिघले 
तन्हाई के जाने ये आलम कौन सी ?

पेड़ों के  कतारों की बीच की पगडण्डी 
कब से न जाने खड़ी है अकेली 
सुनसान राहें... न क़दमों की आहट 
इंतजार है उसको भी न जाने किसकी !!

बस सूखे पत्तों की गिरने की आहट 
बारिश की टप-टप चिड़ियों की चहचहाहट 
दाखिल हो जाता हूँ अक्सर इस सफ़र में 
है झींगुर के शोर औ पत्तों की सरसराहट !!

कब तक मैं समझाऊँ  इस तन्हां  दिल को
नज्मों से बहलाए - फुसलाये पल को
तन्हाई का साथ छुडाना जो चाहूँ
भीड़ अजनबियों का नहीं भाता है मन को !!

गर कोई बिखरी सी नज़्म मिल जाए
कतरन-ए -ख्वाव पर पैर पड़ जाए
बज़्म-ए-याद से कुछ यादें  दरक जाए
तनहा जीने का फिर सबब मिल जाए  !!








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