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जुलाई 24, 2013

उत्तराखंड की त्रासदी पर


बादलों की गर्जना से 
     घटाएं उमड़-घुमड़ गयी,
चमन से सेहरे बने 
     धरा को देखती रही  !!

 फुहार जब कहर बना 
     जीवन लीलता गया ,
चंद पलों में हज़ार साँसें 
     सिसकियों में बदल गया  !!

 कहर बन बरस मेघ 
     लाशें निगलता रहा ,
नियति का खेल कैसा!
     शहर उजड़ता रहा !!

तलाश है ज़िन्दगी को 
    साँसों का डोर थाम  ले ,
सूनी-नंगी सड़कों पर फिर 
     कदमों को पहचान ले   !! 

नए पत्तों की आहट अब 
     जाने कब सुनाई दे ,
तारे जड़े आसमां औ'
     चाँद  कब दिखाई दे !!

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