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फ़रवरी 12, 2012

मुझमे क्या कुछ....



मुझमे क्या कुछ बाकी है
जीवन ये एकाकी है 
पवन नदी औ ' निर्जन वन ये 
मुझको पास बुलाती है 


मृदु-मृदु ये लहरे बहती 
मंद-मंद सी पवन ये कहती 
विचलित होना न रे ! नर तू 
जीवन अवश्यम्भावी है 
क्या मुझमे कुछ बाकी है ?


व्यर्थ ये जीवन कहूं न कैसे ?
व्यर्थ ये साँसे तजूं न क्यों मै ?
किसी के मन को भाया मै नहीं
उर में भरा ये रूदन है 
फिर भी मुझमे कुछ बाकी है !


आशाओं को सींचूं फिर भी 
भाग्य - पुष्प को खिलाऊँ फिर भी 
काल-विजय का सपना देखूं 
जीवन को जीवंत करना है 
अरे! जीवन में सब कुछ बाकी है ।

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