समर्थक

अक्तूबर 27, 2011

दिग्भ्रमित सी दिशाएँ



दिग्भ्रमित सी दिशाएँ है 
छाया कुहासा चारों और 
दीपशिखा को कुचला किसने 
धुआं का कहीं न और छोर 
                 अन्धतम इतनी गहराई  
                  ज्योत भी मंद पड़ गया 
               बुझ गया दीपक था जिसमे 
               तेल--जीवन बह गया 
वायु में है वेग इतना 
नाव भी भटके है मार्ग 
मंझधार में है या किनारे 
या भंवर में फंसा है नाव 
               ईश से है ये गुजारिश 
               भाग्य में लिख दे यही 
                विपद से रक्षा नहीं !
                मांगू मैं  डरने की सीख 
      

13 टिप्‍पणियां:

  1. मैं मांगू न डरने की सीख ..
    बढिया प्रस्‍तुति !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. "पर्व नया-नित आता जाता" उच्चारण पर लिखा
    जो कहीं कोई याद करता ,थके क़दमों से दिखा
    बिखरे बिखरे विचार कुछ हैं, वो दिल से रहा बता |
    दिग्भ्रमित सी देख दिशाएँ, अब बदली रही सता ||

    आपकी उत्कृष्ट पोस्ट का लिंक है क्या ??
    आइये --
    फिर आ जाइए -
    अपने विचारों से अवगत कराइए ||

    शुक्रवार चर्चा - मंच
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. खुबसूरत प्रस्तुति ||
    आभार|
    शुभकामनायें ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. खूबसुरती से लिखी गई भाव पूर्ण सुंदर रचना,बढ़िया पोस्ट...बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. दीवाली की व्यस्तता में कई दिनों के बाद समय मिला.... शुभकामनाएं....आपको परिवार समेत....!!


    ***punam***
    bas yun...hi..
    tumhare liye...

    उत्तर देंहटाएं

ब्लॉग आर्काइव

widgets.amung.us

flagcounter

free counters

FEEDJIT Live Traffic Feed