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अक्तूबर 27, 2011

दिग्भ्रमित सी दिशाएँ



दिग्भ्रमित सी दिशाएँ है 
छाया कुहासा चारों और 
दीपशिखा को कुचला किसने 
धुआं का कहीं न और छोर 
                 अन्धतम इतनी गहराई  
                  ज्योत भी मंद पड़ गया 
               बुझ गया दीपक था जिसमे 
               तेल--जीवन बह गया 
वायु में है वेग इतना 
नाव भी भटके है मार्ग 
मंझधार में है या किनारे 
या भंवर में फंसा है नाव 
               ईश से है ये गुजारिश 
               भाग्य में लिख दे यही 
                विपद से रक्षा नहीं !
                मांगू मैं  डरने की सीख 
      

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