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मई 24, 2011

मेरे ज़ख्मो को......





मेरे ज़ख्मो को सहलाने की कोशिश न करो 
मेंरे दर्द को बहलाने की साजिश  न करो 
मुझे तुमसे जो दर्दें  सौगात में मिली है 
उन पर मलहम लगाने  की ख्वाहिश न करो 

अश्कों को तो ... पी लिया मैंने 
रिश्ता जो था ... तोड़ लिया मैंने 
अब इन रिश्तो के दरार को 
प्यार  से भरने की कोशिश न करो 

आंसूओं  के समंदर में डूब गया जो दिल 
सपनो के खँडहर में दब गया जो पल 
तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने 
उस आशियाने को उजाड़ने.....आया मत करो 




12 टिप्‍पणियां:

  1. तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने
    उस आशियाने को उजाड़ने.....आया मत करो

    बहुत बढ़िया पंक्तियाँ हैं.

    सादर

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  2. मेरे ज़ख्मो को सहलाने की कोशिश न करो
    मेंरे दर्द को बहलाने की साजिश न करो
    मुझे तुमसे जो दर्दें सौगात में मिली है
    उन पर मलहम लगाने की ख्वाहिश न करो
    ...आदत है इनको जीने की और सच भी है कि ऐसे घाव नहीं भरते

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्यूँ...???
    आखिर क्यों...ऐसा न करें..:)

    एक प्रभावशील रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  4. मुझे तुमसे जो दर्दें सौगात में मिली है
    उन पर मलहम लगाने की ख्वाहिश न करो

    सुंदर पंक्तियां...

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्यार में दिल पे लगे जख्म इतनी आसानी से कहॉ मिटते है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. तन्हाइयों के दरख्तों में जो नींव बनाया मैंने
    उस आशियाने को उजाड़ने.....आया मत करो

    सुंदर पंक्तियां

    उत्तर देंहटाएं
  7. अंतर्मन की नाज़ुक भावनाओं पर आधारित यह कविता दिल को छू गयी.आभार. बहुत-बहुत शुभकामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह वाह
    क्या बात कही है आपने
    दिल से निकली और सीधे दिल में उतर गयी

    उत्तर देंहटाएं

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