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नवंबर 19, 2010

तृष्णा


इन  बारिश की बूंदों को 
तन  से लिपटने  दो 
प्यासे इस चातक का 
अंतर्मन तरने दो 


बरसो की चाहत है 
बादल में ढल जाऊं 
पर आब-ओ-हवा के 
फितरत को समझने दो 

फिर भी गर बूंदों से 
चाहत  न भर पाए 
मन की इस तृष्णा को 
बादल से भरने दो

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर

    मन की तृष्णा को
    बादल से भरने दो

    वाह वाह

    उत्तर देंहटाएं
  2. ► आना जी ,,,
    अंतर्मन की तृष्णा को चाहत की बूंदों से पूरित कर पाने की कोशिश भर है आपकी यह कविता... बहुत सुन्दर रचना है आपकी...

    अगर मौका मिले तो मेरा ब्लॉग भी है भ्रमण के लिए...
    (मेरी लेखनी.. मेरे विचार..)

    .

    उत्तर देंहटाएं
  3. फिर भी गर बूंदों से
    चाहत न भर पाए
    मन की इस तृष्णा को
    बादल से भरने दो


    pyari baat..
    khubshurat andaaj!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. “बरसो की चाहत है
    बादल में ढल जाऊं
    पर आब-ओ-हवा के
    फितरत को समझने दो”
    वाह! क्या लाजवाब लिखा है आपने. विभिन्न ब्लोगों पर जाकर खूबसूरत कवितायें पढ़ना किसी भी सुखद आश्चर्य से कम नहीं है. उतना ही विस्मयकारी है हमारा उन स्थलों पर जाना जिनको हमने पहले कभी नहीं देखा. सचमुच आनंद आ गया आपकी रचनाएँ पढकर. अब तो मेरा भी मन करता है कि मैं आपकी इस ब्लॉग में खो जाऊं और इसकी आबो-हवा और फितरत से कुछ सीख लूं. अश्विनी रॉय

    उत्तर देंहटाएं
  5. तृष्णा की तृप्ति नहीं होती और फिर जब वो मन की तृष्णा हो तो ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. तन से लिपटने दो
    प्यासे इस चातक का
    अंतर्मन तरने दो

    क्या बात hai

    उत्तर देंहटाएं

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