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मई 06, 2017

जीना सिखा दे













ऐ ज़िन्दगी मुझे जीना सिखा दे
अपनों से बिछड़ कर भी खुश होना सिखा दे 
आइने में बसा है जो यादों का डेरा 
उस आईने से अपनों का चेहरा मिटा  दे

हर शख्स खुदगर्ज़  है हर चेहरा नकली
उन चेहरों को ढूंढ़ रही हूँ जो बनते थे असली
बन जाऊँ  मैं  उन जैसा ये चाहत तो नहीं 
इनके साथ जीने का सबक सिखा दे 

मुझसे ये मुखौटा न पहना गया 
असली नकली चेहरे न पहचाना गया 
दुःख के दिन जब भी मेरे सामने आये 
तनहा छोड़ के गए उनसे रुका न गया 





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