समर्थक

फ़रवरी 27, 2014

विविधा


ईश्वरीय प्रेम। …।
जग में है सब अपने
मुक्ताकाश , पंछी , सपने
सुगन्धित धरती ,निर्झर झरने
आह्लादित तन मन
प्रेमदान का स्वर्गीय आनंद।।

प्रकृति चित्रण। ………
धरा,सरिता,औ' नील गगन
प्रस्फुटित पुष्प,वसंत आवागमन,
दारुण ग्रीष्म,शीत,और हेमंत
खग कलरव - गुंजायमान दिक्-दिगंत,
प्रकृति से परिपूर्णता का आनंद।।

प्रेम की विसंगतियां .......
जनमानस से परिपूर्ण इस जग में
एकाकीत्व का आभास रग - रग में
रहता है ये  आतुर मन प्रतीक्षारत
एकाकीत्व लगे अपना सा ।



9 टिप्‍पणियां:


  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.02.2014) को " शिवरात्रि दोहावली ( चर्चा -1537 )" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी इस विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - महादेव के अंश चंद्रशेखर आज़ाद पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  3. महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |
    New post तुम कौन हो ?
    new post उम्मीदवार का चयन

    उत्तर देंहटाएं
  4. शिवरात्रि के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छी कविता , शब्दों का चयन भी अच्छा , भाव प्रवण भी

    उत्तर देंहटाएं
  6. शिवरात्रि के पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनायें...!
    बहुत खूब,सुंदर रचना...!

    RECENT POST - फागुन की शाम.

    उत्तर देंहटाएं

ब्लॉग आर्काइव

widgets.amung.us

flagcounter

free counters

FEEDJIT Live Traffic Feed