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जनवरी 21, 2011

चाँद.....फीका सा

कभी दिन में देखा है चाँद 
      फीका सा 
एक बुझा हुआ दीपक 
      सरीखा सा 


काश इन परिंदों सा 
      उड़ पाऊँ 
चन्दा को धरती पर 
      ले आऊँ 


मल-मल कर चमकाऊँ 
      बुझे तन को 
खिली चांदनी से पावन 
      करे जग को 


जाने क्यों सोचे ये 
    पागल मन 
रिश्ता है चन्दा से 
  शायद कोई पुरातन 

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