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जनवरी 21, 2011

चाँद.....फीका सा

कभी दिन में देखा है चाँद 
      फीका सा 
एक बुझा हुआ दीपक 
      सरीखा सा 


काश इन परिंदों सा 
      उड़ पाऊँ 
चन्दा को धरती पर 
      ले आऊँ 


मल-मल कर चमकाऊँ 
      बुझे तन को 
खिली चांदनी से पावन 
      करे जग को 


जाने क्यों सोचे ये 
    पागल मन 
रिश्ता है चन्दा से 
  शायद कोई पुरातन 

10 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो कहेगे की जैसा भी रिश्ता हो मगर चाँद के साथ ये रिश्ता है बड़ा अनोखा....

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  2. शब्दों की बेहतरीन जादुगरी। आभार।

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  3. जाने क्यों सोचे ये
    पागल मन
    रिश्ता है चन्दा से
    शायद कोई पुरातन..

    सही कहा है..चंदा मामा से परिचय तो जन्म लेते ही हो जाता है और उसकी तलाश जिंदगी भर कभी प्रेयसी के चहरे के रूप में कभी अपना दर्द सुनाने के लिए होती रहती है. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. कभी दिन में देखा है चाँद फीका सा
    एक बुझा हुआ दीपक सरीखा सा

    बेहतर

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर बार अलग ही रूप में नज़र आता है. चाँद अच्छी प्रस्तुती

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  6. अना जी,

    एक अच्छी कविता से होकर गुजरा......असर कुछ और देर बना रहेगा।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी
    कवितायन

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  7. काश इन परिंदों सा
    उड़ पाऊँ
    चन्दा को धरती पर
    ले आऊँ

    काश....पंख होते...
    सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  8. कविता बहुत सुन्दर और भावपूर्ण है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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