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जनवरी 06, 2011

यारा लगा मन...........


 ..
यारा लगा मन फकीरी में 
न डर खोने का 
न खुशी कुछ पाने का 
ये जहां है अपना 
बीते न दिन गरीबी में 

यारा लगा मन फकीरी में 

जब से लागी लगन उस रब से 
मन बैरागी सा हो गया 
पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को 
ये फकीरा काफ़िर बन गया 

मन फकीरा ये जान न पाए 
आखिर उसे जाना है कहाँ 
रब दे वास्ते ढूंडन लागी 
रास्ता-रास्ता गलियाँ-गलियाँ 

क्या करूँ कुछ समझ न आये 
उस रब दे मिलने के वास्ते 
ढूँढ लिया सब ठौर-ठिकाने 
गली,कूचे और रास्ते 

जाने कब जुड़ेगा नाता 
और ये फकीर तर जावेगा 
सूख गयी आँखे ये देखन वास्ते 
रब ये मिलन कब करवावेगा
 ..

6 टिप्‍पणियां:

  1. यारा लगा मन फकीरी में
    न डर खोने का
    न खुशी कुछ पाने का
    ये जहां है अपना
    बीते न दिन गरीबी में

    kya baat kah di....sab aisa sochne lage to fir to duniya hi badal jayegi...

    bahut khub!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. अति सुन्दर,
    रब को पाना ही इस नश्वर शरीर का उद्देश्य होना चाहिए
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. जब से लागी लगन उस रब से
    मन बैरागी सा हो गया
    पथ-पथ घूमूं ढूंडू पिया को
    ये फकीरा काफ़िर बन गया
    अना जी, गहरे भाव है कविता में ......सुंदर प्रस्तुति.
    .
    नये दसक का नया भारत (भाग- १) : कैसे दूर हो बेरोजगारी ?

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut sunder kavita hai aapki

    mai aapko follow kar rhi hu
    kabhi yaha bhi aaye
    www.deepti09sharma.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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