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अक्तूबर 12, 2010

चढ़कर इश्क की


चढ़कर इश्क की कई मंजिले
अब ये समझ आया
इश्क के दामन में फूल भी है
और कांटे भी
और मेरे हाथ काँटों भरा
फूल आया
-------------
फूल सा इश्क पाकर
फूला न समाया
पर बेवफाई का काँटा हर फूल ने
ज़रूर चुभाया
----------------
अब तो मेरी हालत देख
दोस्त ये कहे
इश्क का तो यही ताकाज़ा है
तेरा दिल हर फूल पे
क्यों आया

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर भावनापूर्ण अभिव्यक्ति...प्रेम की कशिश बिना दर्द के महसूस नहीं की जा सकती...अति सुन्दर...आभार

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  2. बेहतरीन रचना...यह ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई...

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  3. काँटे ही फूल की अहमियत बताते हैं

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  4. यही दस्तूर है मुहोब्बत का
    एक तरफ वफ़ा तो
    दूसरे पहलु में
    जफा को बाँध लाएगी.

    यादो में वफ़ा के जी सके तो जो
    बेवफाई वर्ना मार जायेगी.

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  5. प्रेम का प्राप्य तो आंसू, पीड़ा और एक कभी न खत्म होने वाली टीस है और उसी में उसकी सार्थकता छिपी हुई है. खूबसूरत रचना. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  6. तेरा दिल हर फूल पर क्यूं आया। सुन्दर पंक्ति , ख़ूबसूरत कविता।

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  7. phool ki khoobsurati aankhon par pattin bandh deti hai aur nazar uske saath jude kaantein dekh nahi paati ... bahut khoobsurat rachna ...

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  8. .प्रेम की कशिश बिना दर्द के महसूस नहीं की जा सकती.प्रेम तो आंसू है , पीड़ा है ........

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  9. बहुत ही सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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