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हमने रखे हैं नक्शे पा आसमां के ज़मीं पर अब ज़मीं को आसमां बनने में देर न लगेगी टांग आयी हूँ सारे ग़म दरो दीवार के खूंटी पर अब वफ़ाओं...
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कदम से कदम मिलाकर देख लिया आसान नहीं है तेरे साथ चलना तुझे अपनी तलाश है मुझे अपनी मुश्किल है दो मुख़्तलिफ़ का साथ रहना यूँ तो तू दरिया और ...
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ये चीत्कार ! ये हाहाकार ! ये संहार !!! क्यों ? ये संत्रास ! ये परिहास ! सब बदहवास ! क्यों? ये वारदात ! ये मारकाट ! सब बरबाद...

बहुत सुंदर रचना,,,,
जवाब देंहटाएंMY RECENT POST:...काव्यान्जलि ...: यह स्वर्ण पंछी था कभी...
बहुत खूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना...
जवाब देंहटाएं:-)
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
जवाब देंहटाएंआपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
जवाब देंहटाएंमित्रता की ये धार यूँ ही बनी रहे
जवाब देंहटाएंWaaah.... Bahut khoob!
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया अभिव्यक्ति ...
जवाब देंहटाएंShed all negative feelings and place the positivity in heart. Lovely poem!
जवाब देंहटाएंके बारे में महान पोस्ट "मित्रता दृढ़ता से धर !"
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना अनामिका जी
जवाब देंहटाएंखुदा जो देता रहा मुश्किलें हरदम
मेरा हौसला मेरी ताकत हो जाने वाले
दोस्त भी उसने दिये साथ निभाने वाले