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अगस्त 12, 2013

अकेले चले थे.....














अकेले चले थे , तन्हां सफ़र था
मुसाफिर मिले जो... राहें जुदा थी 
लम्बी सी सड़कें और दिन पिघले-पिघले 
तन्हाई के जाने ये आलम कौन सी ?

पेड़ों के  कतारों की बीच की पगडण्डी 
कब से न जाने खड़ी है अकेली 
सुनसान राहें... न क़दमों की आहट 
इंतजार है उसको भी न जाने किसकी !!

बस सूखे पत्तों की गिरने की आहट 
बारिश की टप-टप चिड़ियों की चहचहाहट 
दाखिल हो जाता हूँ अक्सर इस सफ़र में 
है झींगुर के शोर औ पत्तों की सरसराहट !!

कब तक मैं समझाऊँ  इस तन्हां  दिल को
नज्मों से बहलाए - फुसलाये पल को
तन्हाई का साथ छुडाना जो चाहूँ
भीड़ अजनबियों का नहीं भाता है मन को !!

गर कोई बिखरी सी नज़्म मिल जाए
कतरन-ए -ख्वाव पर पैर पड़ जाए
बज़्म-ए-याद से कुछ यादें  दरक जाए
तनहा जीने का फिर सबब मिल जाए  !!








अगस्त 01, 2013

मधुर तेरी बंसी














मधुर तेरा अंदाज़ 
मनहर सुर और नटवर साज़ 
भागे क्यों मन सुन आवाज़ 
सुरताल का तू सरताज 
मनभाया तेरा अंदाज़  !!

मधुर तेरी मुस्कान 
विरहा ये मन पाए सुकून 
सुन मधुर बंसी की धुन 
किस बगिया से लाया चुन 
मन भागे पीछे पुन-पुन  !!

मधुर तेरी माया 
बारिश की बूँदें रिमझिम 
इस तन पर लगे सुर सम 
सुन गुहार वंशी वाले 
दे दरस छंट जाये तम !!

मधुर तेरी बंसी 
सुन नृत्य करे धरा छम-छम 
फूल खिले गुलशन -गुलशन 
ताल - नदी- झरने-सागर 
बात जोहते है क्षण-क्षण !!

मधुर तेरी पूजा 
हे बंसीधर बंसी बजैया 
पार लगाओ हमारा खेवैया 
माया - मोह से हमें उबारो 
सुनाकर मोक्षदायिनी धुन !!


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