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नवंबर 29, 2011

कुछ फर्क नहीं पड़ता

नेता कर ले चाहे बड़े-बड़े घोटाले 
पशुओ को पड़े चाहे चारों के लाले 
वतन हो जाए चाहे दुश्मनों के हवाले 
पर कुछ फर्क नहीं पड़ता ||


विदेशी सरकार चाहे देश को लूटे
भाषाई अखण्डता चाहे खंड-खंड टूटे 
सरकारी नीति चाहे कहर बन टूटे 
पर कुछ फर्क नहीं पड़ता ||


महंगाई का मार हमने सहर्ष झेला
कुटीर उद्योगों को हमने कूएं में धकेला 
प्राकृतिक उपादानो को यूं ही बेकार कर दिया 
पर कुछ फर्क नहीं पड़ता ||


प्रशासन नेताओं की कठपुतली बन रह गयी 
दबंगों की दबंगई जनता को बेहाल कर गयी 
हत्यारों लुटेरों ने आतंकियों से नाता जोड़ लिया 
सुन लो देश  के तथाकथित आकाओं !!!!!!!
आम जनता को फर्क पड़ता है ||

नवंबर 24, 2011

रिश्तो को गहराने दो


धीरे धीरे रूहानी  रिश्तो को गहराने दो 
शाख से जुड़े कच्चे  लम्हों को पक जाने दो 


परिंदों का उड़ना ही  था की पर काट दिए 
चिंगारी को ज़रा सा उड़ने की खुमारी दे दो 


लम्हे गिरेंगे शाख से जब पक जायेंगे ये कच्चे पल
संभालना है मुझे तारीखों में बसे पके हुए कल


फिर ये कैसा ठहराव है इस वीरान जिंदगानी में 
इन प्यार के कतरों को दरियाई गहराई दे दो 





नवंबर 14, 2011

वक़्त गुज़रा हुआ


तू है वक़्त गुज़रा हुआ 
मुरझाया फूल किताबों में रखा 
तुझे न याद करूँ एक पल से ज्यादा 
कि दिल में तू नहीं अब कोई और है 


तुम से खिला करती थी जो बगिया 
इंतज़ार में पल गिनता था ये छलिया 
अब उन लम्हों में खुशबू बिखेरा जिसने 
वो अब तुम नहीं कोई और है 


ख़्वाबों में, नींदों में, ख्यालों में नहीं तुम 
राह पर, मोड़ पर , धडकन में नहीं तुम 
अब रात गुज़रती है जिनके अरमान लिए 
वो अरमान नहीं तुम ..कोई और है 


वो जो है मेरी आज की ख्वाहिश 
उसका सदका उतार दूं न रहे खलिश 
बिछड़ने का डंक डसा था जिसने 
वो कोई और नहीं वो तू ही है 



नवंबर 10, 2011

जलधि विशाल

जलधि विशाल तरंगित ऊर्मि
नीलांचल नाद झंकृत धरणी 
कल-कल झिन्झिन झंकृत सरिता 
पारावार विहारिणी गंगा 


तरल तरंगिनी त्रिभुवन तारिनी 
शंकर जटा  विराजे वाहिनी 
शुभ्रोज्ज्वल चल धवल प्रवाहिनी 
मुनिवर कन्या हे ! भीष्म जननी 




पतित उद्धारिणी जाह्नवी गंगे 
त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे 
महिमा तव गाये धरनीचर 
मोक्ष प्राप्त हो जाए स्नान कर 


हरिद्वार  काशी पुनीत कर 
बहे निरंतर कल-कल छल-छल 
सागर संगम पावन पयोधि 
गोमुख उत्स स्थान हे वारिधि 


सर्वदा कल्याणी द्रवमयी 
मोक्षदायिनी जीवनदात्री 
बारम्बार नमन हे जाह्नवी 
वरदहस्त रखना करुणामयी 

नवंबर 06, 2011

कहानी दे गए


जाते हुए एक कहानी दे गए
दर्द-ए-दिल की एक निशानी दे गए
.
दिल में उसके बस जाने की उम्मीद थी
ग़म के दरिया में वो डुबोकर चले गए
.
हवाओं में बसे प्यार की खुशबू भी
जाते-जाते यूं चुराकर ले गए
.
एक अहसान जो उसने कर दिया
प्यासे को आंसूं पिलाकर चले गए
.
अब के आना तो बस इतना करना
शम्मा जलाना ऐसे की बस जलती रहे
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नवंबर 04, 2011

कोयल की कूक


गूंजे कोयल की कूक से
जंगल में मीठी तान
पवन चले मंद मंद
गाये दादुर गान ,


आम्र मंजरी के महक से
महके वन-वनांतर
पथिक का प्यास बुझाए
नदी बहे देश-देशांतर


पक्षियों के कलरव से
गूंजे धरती आसमान
पुष्प-पुष्प सुगंध से
महकाए ये जहान


बेशक ये बयार भी
हृदयों को मिलाये
पत्तों के झुरमुट से
चाँद भी झिलमिलाये 

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