अक्तूबर 29, 2011

मैं जिंदा हूँ

मैं जिंदा हूँ 
अन्याय का खिलाफत मैं कर नहीं पाता
कुशासन-सुशासन  का फर्क समझ नहीं पाता 
प्रदूषित हवा में सांस लेता हूँ 
पर मैं जिंदा हूँ 

सरकारी तंत्र से शोषित हूँ मैं 
बिना सबूत आरोपित हूँ मैं
खुद को  साबित मैं  कर नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

दिल से चीत्कार उठती है 
मन में हाहाकार मचती है 
होंठों से कोई शब्द निकल नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

रक्त में उबाल अब भी है 
भावनाओं में अंगार अब भी है 
बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से 
काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से 
नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों  का ,
एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता 
पर मैं जिंदा हूँ 

अक्तूबर 27, 2011

दिग्भ्रमित सी दिशाएँ



दिग्भ्रमित सी दिशाएँ है 
छाया कुहासा चारों और 
दीपशिखा को कुचला किसने 
धुआं का कहीं न और छोर 
                 अन्धतम इतनी गहराई  
                  ज्योत भी मंद पड़ गया 
               बुझ गया दीपक था जिसमे 
               तेल--जीवन बह गया 
वायु में है वेग इतना 
नाव भी भटके है मार्ग 
मंझधार में है या किनारे 
या भंवर में फंसा है नाव 
               ईश से है ये गुजारिश 
               भाग्य में लिख दे यही 
                विपद से रक्षा नहीं !
                मांगू मैं  डरने की सीख 
      

अक्तूबर 25, 2011

दिवाली की सबको शुभकामनाएं


मन के अंध-तमस को हरकर
सुख-समृद्धि आँचल में भरकर 
दुःख-क्लेश सब दूर भगाकर 
मंगलमयी दिवाली आयी 
 
झांझ-मंजीरा ढोल बजाओ 
फुलझड़ियाँ  भी खूब जलाओ 
लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी 
मिष्टान्न का भोग लगाओ 


पर्व फिर दीयों का आया 
पुलकित हुआ ये मन ये काया 
अंधकार था जो समाया 
आलोकित हुआ जग सारा 
आओ मिलकर खुशियाँ मनाएं 
फुलझडियों से स्वागत-गीत गायें 
खुशियों से भर दे धरती को 
मन के तम को दूर भगाएं 
एक शपथ ले हम सब मिलकर 
आग पटाखों से संभलकर 
खुशिओं को आज गले लगाएं 
दिवाली की सबको शुभकामनाएं 

अक्तूबर 24, 2011

दिन की शुरुआत


तुम्हारे आने से सुबह की शुरुआत हुई 
दिन भर लीगों से मेलजोल मुलाक़ात हुई 
मेरे फ़रियाद को सुन रब ने ये कह दिया 
जिससे दिन की शुरुआत हुई उसे इल्म ही तो न हुई 

अक्तूबर 21, 2011

नदी के पार

नदी के पार कोई गाता गीत 
उस स्वर में बसा है मन का मीत 
नदी की लहरों खेतों से उठकर 
आती ध्वनि मन लेता जीत 

होगा इस पार जो लेगा सुन 
इस देहाती गानों का उधेड़-बुन 
इन एकाकी गानों को सुनकर 
मरकर भी जी लेगा पुन-पुन 

भानु-चन्द्र का है आलिंगन 
प्रकाश से भरा है लालिमांगन 
इन गीतों ने छेड़ा है फिर से 
राग-अनुराग का आलापन 

अक्तूबर 17, 2011

चलो न चले


चलो न चले 
पकडे डूबते सूरज को 
जाने न दे उसे 
 रोक ले क्षितिज में

चलो न चले 
बहते पवन के साथ 
चलते चले हम भी 
कहीं कोई पुरवाई चले 

चलो न चले 
चाँद की धरातल पर 
सूत कातती है वहाँ 
एक अनजानी सी बुढिया

रोक ले उसे 
मत कातो ये धागे 
ये धागे 
रिश्ते नहीं बुनते 

चलो न चले 
उस जहां में जहां 
न सूरज डूबे 
न ही कोई रिश्ता टूटे 

अक्तूबर 07, 2011

तनहा ज़िन्दगी




तनहा  ज़िन्दगी में गुजर बसर करते है 
काफिले के साथ भी तनहा-तनहा चलते है 


दिन में भीड़ करती है मुझे परेशान 
रात को तन्हाई में भी सोया नहीं करते है 


परछाईं को देख मैं हूँ इस कदर हैरां
गुजरी उम्र ...हम अकेले चला करते है 


रात का सन्नाटा आवाज़ देती है मुझे 
जाऊं कैसे हम तो तन्हाई में डूबे रहते है 


अक्तूबर 01, 2011

आँखों की भाषा....

आँखों की भाषा पढना सीखो 
खामोशी को चुपके से सुनना सीखो 
शब्द बिना बोले लब से 
जुबां की भाषा समझना सीखो 


सुनो  गुनगुनाती हवा को 
सन सन सन सन कहती है क्या 
शब्दों की मद्धिम आहट सुनकर 
क़दमों को पहचानना सीखो 


छूना न ठहरे पानी को 
इक इक लम्हा गिर जाएगा 
चटक जायेंगी गहराइयां 
ग़म का प्याला दरक जाएगा 


जुबां तुम न खोलो पिया
आँखों से खोलो जिया 
नयनों के अश्कों की 
भाषा को समझना सीखो 

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