समर्थक

जुलाई 30, 2011

न जाने दिन.......


न जाने दिन कैसे बीतेंगे बरसात के 
भीगे दिन रात और नम हैं पलके 

आँखों में धुएं से सपने 
ख्वाबों ने रात  है बुझाये 
सुलगती है आंसू नयन में 
बारिश है आग लगाती 

न जाने दिन कैसे बीतेंगे बरसात के 
भीगे दिन रात और नाम ही पलके 
तुझे दिल याद करती है 
छलका के नीर  नयनों में 
गिले शिकवे भुलाकर दिल 
संजोये ख्वाब पलकों में 

ग़म में डूबा इस दिल को 
बूंदों ने उबारा है 
बारिश की नेह-बूंदों से 
सपनों को सजाया है 

सपनो को हकीक़त से 
सींचने तुम आओगे 
कांच की इन बूंदों से 
बगिया ये महकाओगे 


रिश्तों को जी लेने दो 
बस नाम का रिश्ता नहीं 
आ जाओ इस सावन में 
रिश्तों को नाम दे दो 



जुलाई 21, 2011

तेरा आना......


                  
वक्त बेवक्त तेरा आना अच्छा लगता है
यादों के सागर में डूबना अच्छा लगता है 
चुटकियों में दिन गुज़रकर शाम जो हो जाती है 
तेरी यादों में तारे गिनना भी अच्छा लगता है ||

ये यादें भी बेमुरव्वत बेवफा होती है 
कभी आती है तो कभी गुम हो जाती है 
नफरत है तेरी यादों से जो रुला जाए बार बार 
पर मरहम भी तो दिल को तेरी याद ही लगाती है ||

वजह यही है तेरी यादों को सजोने का 
एक बेवफा  के प्यार को ज़ुदा न करने का 
रौशनी तले अँधेरा है ये मेरा दिल भी जाने 
पर कोशिश है अँधेरे में दिया जलाने का ||



जुलाई 19, 2011

ये काली घटा ने......





ये काली घटा ने देखो
क्या रंग दिखाया
नाच उठा मन मेरा
हृदय ने गीत गाया

सूखी नदियाँ प्लावित हुई
जीवन लहलहाया
दादुर,कोयल,तोता,मैना ने
गीत गुनगुनाया

तप्त धरती शीतल हुई
बूंदे टपटपाया
धरती ने आसमान को छोड़
बादल को गले लगाया

रवि ज्योति मंद पड़ा
मेघ गड़गड़ाया
नृत्य मयूर का देख
ये मन मुस्कराया


जुलाई 15, 2011

मन पंछी...


मन पंछी क्यों चाहे 
फुर-फुर-फुर उड़ जाऊं 
बैठूं उस बादल में 
सूरज को धर लाऊँ 

काली रात न आये 
दिन ही दिन छा जाए 
मन की कालिमा पर 
धूप ही धूप भर जाए 

दिन का उजाला तो 
मन के कालेपन को 
तिल-तिल कर छाटेगा
विश्वास है इस मन को 

मन फिर भी ये सोचे 
गर रात फिर न आये 
दिन की ज़रुरत को 
कैसे समझ पाए 

दिन-रात बहाना है 
जग को बताना है 
एक दूजे के बिन ये 
सब कुछ बेगाना है 



जुलाई 10, 2011

तन्हाइयों में रोकर...


तन्हाइयों में रोकर दिल बहलाते है 
बिखरे ग़म को सिलकर ग़ज़ल बनाते है 

यादें जो तुमसे है जुड़ी वो अक्सर छेड़ जाते है 
तेरी यादों के बज़्म में हम खो जाते है 

शबनम का कतरा..... दरिया बनाती है 
आस तुमसे मिलने की किनारा दिखाती है 

शबनम के कतरे को यूं बेकार न समझो 
इस नासूर दिल को ये मरहम लगाती है 



जुलाई 08, 2011

प्रकृति


जो घूमती है ये धरा
तो है दिन रात का माजरा 
है चाँद की सोलह कला
है सूर्य से रोशन धरा 

शीतल जो ये बहे बयार 
गुंजरित है ये बहार 
कलियाँ जो है अधखिली 
प्रस्फुटित करे बयार 

शीत ऋतू तो है दबंग 
काँप जाए अंग अंग 
सूर्य और चन्द्रमा भी 
ताप ला न पाए संग 

ग्रीष्म भी है चंचला 
लू चलाये मनचला
उत्ताप-ताप से भरा है 
तप्त दिन औ रात गला 

वृष्टि भी तो है अजब 
हो अमीर या गरीब 
स्नेह-धार से भिगोये 
चल न पाए तरकीब 

दिन-रात ये मौसम 
चले ये साथ,औ हम 
भी साथ-साथ चले 
अद्भुत प्रकृति-मानव संगम 






जुलाई 01, 2011

बूँद न टपक जाए




बूँद  न टपक जाए पलकों से 
थाम लूं हाथों से सपनो को 
बंद पलकों से सपने क्या ख़ाक गिरेंगे 
खोल लो इन बंद पलकों को 

              आँखों ने रची थी साजिश 
              पलने न देंगे ख्वाबों को 
              बुनने न देंगे ज़िन्दगी के 
              उधड़े तानो बानो को 

लाख बचा लो सपनो को 
है वो रेत का महल आखिर 
टूटेगा सपना गिरेगा महल 
सच्चाई हो जायेगी ज़ाहिर 
         
                 पलके है अस्मत आँखों की 
                 नज़रों को नज़रों से बचाना है 
                खुले पलकों में ऐ कमबख्त
               ख्वाव कैसे पलता है . 
                

ब्लॉग आर्काइव

widgets.amung.us

flagcounter

free counters

FEEDJIT Live Traffic Feed