अप्रैल 30, 2011

कश्ती दरिया में………।


कश्ती दरिया में इतराए ये समझकर
दरिया तो अपनी है इठलाऊं इधर-उधर

किनारा तो है ही अपना ,ठहरने के लिए
दम ले लूंगा मै भटकूँ राह गर

पर उसे मालूम नही ये कमबख्त दरिया तो
किनारों को डुबो देता है सैलाब में

कश्ती को ये बात कौन बताये जालिम
ना दरिया अपनी न किनारा अपना

e sakhi radhike1.m...

अप्रैल 28, 2011

द्रौपदी





 एक नारी के मन की -
व्यथा हो तुम 
धूलिसात अभिमान  का 
प्रतीक हो तुम 
रिश्तों में छली गयी 
नारी हो तुम 
पर निष्ठुर  भाग्य को धता 
देती हो तुम 
अंतस  की  पीड़ा  का 
आख्यान हो तुम
द्युतक्रीडा के परिणाम का 
व्याख्यान हो तुम 
भक्ति की पराकाष्ठा  को 
छूती हो तुम  
एक अबला की सबल -
गाथा हो तुम 
मर्यादित रिश्तों की 
भाषा हो तुम 
एक सुलझी हुई नारी की 
पहचान हो तुम 

अप्रैल 23, 2011

बात ...दिल की


घुप्प रात का अँधेरा 
परछाई का नहीं नामोनिशाँ
फिर ये साया कौन? 
जो मेरा हमराही है बन रहा 


तुझसे बिछड़कर मरने का 
कोई इरादा तो नही 
इश्क किया है तुझसे 
पर इतना बेपनाह तो नही 


एकटक सितारों को क्यों देखते हो 
इन सितारों से मिलने का तमन्ना तो नहीं ?

अप्रैल 19, 2011

गुहार

मेरे घर के आगे है पथरीली ज़मीन
हो सके तो आओ इन पत्थरों पर चलकर

पूनम की चाँद ने रोशनी की दूकान खोली है
खरीद लो रोशनी ज़िंदगी रोशन कर लो

गीली मिटटी है न चलो इतना
की कदमों के निशाँ को मिटा न पाऊँ
आखिर किसी को पता न चले
यहाँ रास्ता मेरे घर से होकर गुज़रता है



अप्रैल 08, 2011

मन कोयला .....

 मन कोयला बन जल रख हुई 
धूआं उठा जब इस दिल  से 
नाम तेरा ही लिखा फिर भी 
हवा में, बड़े जतन से 


        तेरी याद मन के कोने से 
        रह-रह कर दिल को भर जाए 
        जिन आँखों में बसते थे तुम 
              उन आँखों को रुला जाए 


जाने क्यों दिल की बस्ती में 
है आग लगी ,दिल जाने ना,
पूछ न हाल इस दिलजले का 
जलता जाए बुझ पाए ना 



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