फ़रवरी 21, 2011

आँखों से झांकते...........

             (1)
आँखों से झांकते हुए तुम दिल में उतर गए
हया का पर्दा है जो तुम्हे मुझसे है अलग करता
             (2)
तुम्हे पाने की आरज़ू ने मुझे दीवाना बना दिया
तुम्हारे प्यार को पाना मैंने मकसद बना लिया
तुम्हे न पाने से जो सूरत-ए-हाल होगा सनम
ये सोचना भी दिल गवारा नही करता

फ़रवरी 09, 2011

कवि की नायिका तू अति सुन्दर

Beautiful Indian Paintings Collection


अधर सुन्दर
वदन सुन्दर
नयन सुन्दर
हँसी सुन्दर
ह्रदय सुन्दर
गमन सुन्दर
कवि की नायिका तू
अति सुन्दर
————————
वचन सुन्दर
चरिता सुन्दर
वसन सुन्दर
करवट सुन्दर
चलना सुन्दर
भ्रमण सुन्दर
कवि की नायिका तू
अति सुन्दर
————————-
नृत्य सुन्दर
गीत सुन्दर
भोजन सुन्दर
शयन सुन्दर
रूप सुन्दर
तिलक सुन्दर
कवि की नायिका तू
अति सुन्दर
—————————
गुंजन सुन्दर
माला सुन्दर
पुष्प सुन्दर
कंटक सुन्दर
अंजलि सुन्दर
ये पग सुन्दर
कवि की नायिका तू
अति सुन्दर

फ़रवरी 07, 2011

जाह्नवी हूँ .........


 मै नदी हूँ .............
पहाड़ो से निकली 
नदों से मिलती 
कठिन धरातल पर              
उफनती उछलती 
प्रवाह तरंगिनी हूँ 
                                   

परवाह किसे है 
ले चलती किसे मै 
रेट हो या  मिटटी   
न छोडूँ उसे मै 
तरल प्रवाहिनी हूँ 
                               
राह बनाती 
सागर जा मिलती 
 पर्वत से अमृत को 
लेकर मै चलती 
न आदि न अंत 
शिव जटा से प्रवाहित           
जाह्नवी हूँ 
                                      

फ़रवरी 01, 2011

प्रेम पीड़ा


हृदय है आहत  दग्ध -निश्चल
प्रेम में तुमने किया है छल
यद्यपि मैं नहीं करुँगी अब स्मरण
उन यादों को , पर न बिसारूँ वो क्षण
प्रण था तुम्हारा साथ रहोगे  आमरण
पर ये क्या तुमने बिखेर दिया मेरा कण-कण

निद्रा हुई शत्रु रात्रि बना काल
लगे समाप्त कर दूं ये व्यर्थ जीवन काल
न सूझे मुझे और कोई मार्ग
तप्ताहत हूँ दग्ध हो रही हूँ जैसे आग

बिखेरना ही था तो तुम मोती बिखेरते
देना ही था तो तुम संग-सुख ही देते
ये क्या पीड़ा दिया तुमने आजीवन का
जीवन बना अर्थ हीन श्वास सर्प-दंश सा

प्रेम-विरह है असहनीय ये ज्ञान न था
राह पे पड़े पत्थरों का भान न था
प्रेम मे मिलन सुख का ही आभास था मुझे
विरह-वेदना का तनिक भी अहसास न था मुझे

इस जीवन जंजाल को ढो रही हूँ मै
मानो पत्थर की मूरत हूँ जड़ हो गई हूँ मै
क्या यही है वास्तविकता सच्चे प्रेम का
नहीं ! ये तो एक पक्ष है प्रेमजीवन  का

दूसरा पक्ष भी है प्रेम का, बड़ा सुखदाई
आमरण प्रेम ,सहजीवन जिसमे खुशी है समाई
तभी तो सब निस्संग को त्याग ये सुख है अपनाते
आजीवन सुख देते और साथ निभाते

यह तो मरे भाग्य था जो यह  हो न सका
इस स्वर्गीय सुख से वंचित मन रो न सका
मन चाहे मैं प्रेम में तटस्थ हो जाऊं
कर्म और भाग्य  के समन्वय पर ही निर्भर रह जाऊं

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