नवंबर 30, 2010

दिन तो बदलते.........


दिन तो बदलते है
जीते है मरते है
अपनी इस दुनिया में
पल पल फिसलते है


क्षण-भंगुर ये काया
भटकाती है माया
मन के इस भटकन से
बारम्बार छलते है


चलायमान सांसो का
गतिमान इस धड़कन का
नश्वर इस काया से
मोहभंग होना है

सावन फिर आयेगा
बदरा फिर छाएगा
ऋतुओं को आना है
आकर छा जायेगा


मन के इस पंछी को
तन के इस पिंजरे में
सहलाकर रखना है
वर्ना उड़ जायेगा


रे बंधु सुन रे सुन
नश्वर इस काया की
माया में न पड़ तू
वर्ना पछतायेगा

नवंबर 19, 2010

तृष्णा


इन  बारिश की बूंदों को 
तन  से लिपटने  दो 
प्यासे इस चातक का 
अंतर्मन तरने दो 


बरसो की चाहत है 
बादल में ढल जाऊं 
पर आब-ओ-हवा के 
फितरत को समझने दो 

फिर भी गर बूंदों से 
चाहत  न भर पाए 
मन की इस तृष्णा को 
बादल से भरने दो

नवंबर 02, 2010

नि:शब्द



खामोश हम तुम
बात ज़िन्दगी से
आँखों ने कुछ कहा
धड़कन सुन रही है



धरती से अम्बर तक
नि:शब्द संगीत है
मौसम की शोखियाँ भी
आज चुप-चुप सी है



गीत भी दिल से
होंठ तक न आ पाए
बात दिल की
दिल में ही रह जाए

.
जिस्मो की खुशबू ने
पवन महकाया है
खामोशी को ख़ामोशी ने
चुपके से बुलाया है

.
प्यार की बातों को
अबोला ही रहने दो
नि:शब्द इस गूँज को
शब्दों में न ढलने दो

.
प्यार के भावो को
शब्दों में मत बांधो
चुपके से इस दिल से
संगीत का स्वर बांधो

.
स्वर ही है इस मन के
भावो को है दर्शाती
प्यार जो चुप चुप है
जुबां से निकल आती

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